काव्य गुण

काव्य गुण :  

रस के उत्कर्ष में सहायक तत्वों को काव्य गुण कहते हैं।
       जिस प्रकार आत्मा के शूरता , कायरता आदि धर्म या गुण होते हैं, उसी प्रकार रस के धर्म गुण कहे जाते हैं।ये काव्य के नित्य धर्म होकर रस का उत्कर्ष बढ़ाते हैं।

भरत मुनि ने काव्य गुणों की संख्या दस निर्धारित की है

1.श्लेष 
2. प्रसाद
3.समता 
4.समाधि
5.माधुर्य
6.ओज
7.सौकुमार्य
8.अर्थ शक्ति
9.उदारता
10.कान्ति

-आचार्य दण्डी इन्हीं दस गुणों को काव्य गुण मानते है

- आचार्य मम्मट ने काव्य ने  'काव्य प्रकाश ' में सभी  गुणों का समाहार तीन गुणों में किया है 

1. ओज गुण 
2. प्रसाद गुण
3. माधुर्य गुण 

1. ओज गुण :- 
  •    ओज शब्द का अर्थ - तेज , प्रकाश , दीप्ति
  •   जो रचशा सुनने वाले के मन में उत्साह , वीरता , आवेश  आदि जाग्रत करने की शक्ति रखती है , उसे ओज गुण कहा जाता है।

-आचार्य भरत मुनि ने समास युक्त पदों वाली , गंभीर   अर्थयुक्त , श्रवण सुखद पदावली को ओज गुण के उपयुक्त   बताया है।

-दण्डी ने समास युक्त पदों की बहुलता से पूर्ण  ऋचना को ओज गुण संयुक्त माना है।

-आचार्य वामन की मान्यता में संयुक्त अक्षरों व संश्लिष्ट पदों का संयोग आवश्यक है।

- विश्वनाथ के अनुसार ओज गुण युक्त रचना में महाप्राण    वर्ण , संयुक्ताक्षर प्रयोग ।

-आचार्य मम्मट ने वीर रस , वीभत्स रस ,रौद्र रस 
  में ओज गुण की  अधिकता मानी है।

ओज गुण की परिभाषा :---
  जिस काव्य रचना को सुनने या पढ़ने में चित्त का विस्तार  हो और मन में तेज उत्पन्न हों , वहाँ ओज गुण अभिव्यंजित   होता है । 

ओज गुण की पहचान 

1. इसमें द्वित्व वर्णों  की अधिकता 
2. संयुक्त वर्णों  का प्रयोग 
3. रेफ , पुरूष वर्णों  तथा लम्बे लम्बे सामासिक शब्दों का प्रयोग
4. मूर्धन्य ध्वनियों का प्रयोग
आदि विशेषताएं ओज गुण की पहचान है


ओज गुण के उदाहरण:-

1. गिर गिर कर भू पर रूण्ड उठे
    कर अट्टहास अरिमुण्ड उठे
    कोलाहल घोर प्रचण्ड उठे 
    रणनाथ पिशाची मुण्ड उठे।

2. बढ़ो करो वीर! स्व जाति का भला 
   अपार दोनों विधि लाभ है हमें 
   किय स्व कर्त्तव्य उबार जो लिया 
   सुकीर्ति पायी यदि भस्म हो गये।

3. हयरूण्ड गिरे , गज झुंड गिरे
   कट कट अवनी पर शुण्ड गिरे
   भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे
   लड़ते लड़ते आदि झुंड गिरे।

2. प्रसाद गुण 
 प्रसाद का शाब्दिक अर्थ होता है -- प्रसन्नता ।
-जिस रचना में सुबोधता , स्वच्छता हो अर्थात् जिस रचना को पढ़कर या सुनकर वो तुरंत समझ में आ जाए ,ऐसी रचना प्रसाद गुण से युक्त मानी जाती है

मम्मट के अनुसार-         
जिस प्रकार आग सूखे ईंधन में तत्काल व्याप्त हो जाती है, उसी प्रकार चित्त में  तुरंत व्याप्त होने वाली रचना में प्रसाद गुण होता है।

आचार्य दण्डी के अनुसार:-
: प्रसाद गुण वहाँ होता है जहाँ सुनते ही शब्द का अर्थ समझ में आ जाए। प्रसाद गुण में सयल , सहज ,भाव व्यंजक शब्दों का प्रयोग किया जाता है
अर्थ की सुबोधता या स्पष्टता इसकी प्रमुख विशेषता होती है।
प्रसाद गुण सभी रसों में विद्यमान रहता हैं।
      भिखारी दास ने इसका लक्षण इस प्रकार लिखा है 
   मन रोचक अक्षर परें , सो है सिथिल शरीर ।
   गुण प्रसाद जल सूक्ति ज्यों , प्रघटै अरथ गम्भीर।।

उदाहरण :-
1. वह आता 
   दो टूक कलेजे के करता 
   पछताता पथ पर आता।

2.देखि सुदामा की दीन दसा,करूना करकै करूनानिधि रोये
   पानी परात को हाथ छुयो नहीं, नैनन के जल सौं पग धौये।

3.जाकी रही भावना जैसी,प्रभू मूरति देखि तिन तैसी.
   देखहिं भूप महार नधीरा, मनहुँ वीर रस धरे सरीरा।

4.यह ऐसा संसार है जैसा सैंवल फूल ,
   दिन दस के व्यौहार को, झूठे रंग न भूल ।

5. विनती सुन लो हे भगवान , हम सब बालक है नादान ।
    विद्या बुद्धि नहीं कुछ पास , हमें बना लो अपना दास ।

6. जाके प्रिय न राम वैदेही
    तजिय ताहि कोटि सम , जद्यपि परम सनेही 

7. चारू चन्द्र की चंचल किरणें , खेल रही हैं जल थल में ।
    स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है, अवनि और अंबर तल में।।

3. माधुर्य गुण :-
  माधुर्य शब्द का अर्थ -  शहद जैसा मीठा ।
    परिभाषा:       
-   जिस काव्य रचना को पढ़कर या सुनकर पाठक या श्रोता का चित्त (मन) द्रवित हो उठे वहाँ माधुर्य गुण होता है।

-दूसरे शब्दों में कहे तो अन्तःकरण को आनन्द , उल्लास से द्रवित करने वाली  कोमल मधूर वर्णो से युक्त रचना में माधुर्य गुण होता है।
 
नोट- शृंगार रस और  करूण रस में  माधुर्य गुण  विद्यमान रहता है।

पहचान :-
1. अनुस्वार युक्त वर्ण 
2. कोमल वर्णो से युक्त पदावली ( क वर्ग, प वर्ग और य र        ल व न्ह ,म्ह ,ल्ह ) का प्रयोग अधिक होता है।
3. परूष वर्णों से रहित पदावली ( ट वर्ग )
4. महाप्राण ध्वनियाँ प्राय कम आती हैं
5. सामासिक पदों का अभाव होता है और यदि आते हैं तो      अल्प सामासिक शब्द 
6. अनुनासिक वर्णों की अधिकता होती है।
7. संयुक्त वर्ण (क्ष,त्र,ज्ञ,श्र,द्ध,द्भ,ह्म,क्र,त्व) नहीं आते हैं।

उदाहरण :-
1. बतरस लालच लाल की ,मुरली धरी लुकाय ।
    सौंह करे, भौंहनि हँसे , देन कहे नट जाय।।

2. मन्द मन्द मुरली बजावत अधर धरे 
    मन्द मन्द निकस्यो मुकुन्द मधु वन तें।

3. अमिय हलाहल मद भरे, श्याम श्वेत रतनार।
    जियत मरत झुकि झुकि परत ,जिहिं चितवन इक बार ।।

   

            

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