- काव्य में दोष उसे कहते हैं जो रस का अपकर्ष करता है। जहां भवन ग्रहण करने में कोई बाधा उत्पन्न हो या गतिरोध आ जाए तो शास्त्र में उसे काव्य दोष कहते हैं
अर्थात् -- जो काव्य के आस्वादन में उद्वेग लाभ करता है या किसी वस्तु के द्वारा कविता का अर्थ ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करता है या उसकी सुंदरता में कमी आती है तो उसे काव्य दोष कहा जाता है।
- काव्य के आस्वादन में वर्ग, शब्द, वाक्य, गठन, अलंकार, रस, छंद आदि का प्रयोग नहीं होता है तो बाधा उत्पन्न होती है और उस रचना का सौंदर्य एवं महत्व घट जाता है।
काव्य दोष के प्रकार :
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काव्य दोष तीन प्रकार के होते हैं
1. शब्द गत दोष 2. अर्थगत दोष 3. रस दोष
मुख्य दोष का विवरण:-
1. श्रुतिकटुत्व दोष -
जब कवि के द्वारा कविता में कठोर भाषा का प्रयोग किया जाता है और जो सुनने में गलत नहीं होते हैं, अटकते हैं तो वहाँ पर श्रुतिकटुत्व दोष होता है।
उदाहरण-
1. कवि की इकटक डटिक रही टरिया अंगुरिन तारि।
2. कवि के कठिन कर्म की करते नहीं हम घृष्टता।
पर क्यों न विषयोत्कृष्टता विचारोत्कृष्टता ।।
( यहां पर घृष्टता , विषयोत्कृष्टता ,विचारोत्कृष्टता जैसे कर्ण कटु शब्दों का प्रयोग होने से सुनने में अच्छे नहीं होते हैं इसलिए यहां श्रुतिकटुत्व दोष होगा )
3. चक्षु कष्ट दण्डित से उसके अश्रुखण्ड मदित आँचल।
4. षड़ कोपाचार्य शण्डिल्य धधक कर
गोलीये सहसा दांत भींचकर।
5. घटित घटित घट घौही अट्ट अट्ट
चट्ट चट्ट चटकत सुहागन की बलियाँ
पट्ट पट्ट आँसु गिरत भूमि झट्ट झट्ट
रट्ट रट्ट नाम हूं पछार खहिं अलिआँ
6. वचन वक्य करि पुच्छा करि, रूष्ट रिच्छ कपि गुच्छ।
सुभट्ट ठह घना पट्ट सम, मरहि रच्छस छीच।।
2. च्युत संस्कृति दोष :-
- जब किसी कविता में कोई शब्द व्याकरण के संबंध में एलायंस होता है। तब भाषा के संस्कार के गिरने के कारण वहां पर च्युत संस्कृति दोष बनता है।
उदाहरण-
1. उजाला में क्षण भर रहा
(यहां पर उजाले के स्थान पर कवि के द्वारा उजाला शब्द का प्रयोग करने के कारण)
2. राजे विराजे मख भूमि में थे
( यहां कवि ने राजा के स्थान पर राजे शब्द का प्रयोग करने से चुत संस्कृति दोष है )
3. अरे अमरता के चमकीले पुतले, तेरे जयनाद
( आपके शब्द के स्थान पर तेरी का प्रयोग करने के कारण )
4. पदार्थ बनन जब सितारा बोला
हरि प्रेरित लक्षिमन मन डोला
(बोले हुए शब्द के स्थान पर बोली लगानी चाहिए)
3. ग्राम्यत्व दोष : -
- जहा पर कवि अपनी कविता में गमारू या बोलचाल की भाषा के शब्दों का प्रयोग करता है तो इसमें शामिल प्रान्तीय या देशज शब्दों के आ जाने से ग्राम्यत्व दोष होता है।
उदाहरण -
1. मूँड़ पे मकई धरे सोहत हैं गोपाल
( मूँड़ शब्द का शिष्ट समाज में प्रयोग नहीं होता )
2. मच्चक मच्चक मत चलो।
(हाँ पर मचक शब्द गँवारू है )
3. पड़े झटोले में नींद न आई राति
4. अश्लीलत्व दोष :-
- जहाँ पर कवि घृणास्पद, लज्जाजनक, या अमंगल सूचक शब्दों का प्रयोग करता है, जिसकी वजह से काव्य में रमेशपन और भद्दापन आ जाता है, तो वहाँ पर अश्लीलत्व दोष होता है।
उदाहरण :-
1. थूक कर चाटने लगे अभी श्रीमान।
( थूककर चाटना अभद्र लगता है )
2. रावण के दरबार में स्थित अंगद पाद
(पाद शब्द से जुगुप्सा या घृणा का भाव पैदा होता है।)
5. क्लिष्टत्व दोष :-
- जब कवि कविता में ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है, वास्तव में सत्य से अर्थ नहीं होता है, उनके अर्थ को समझने में बड़ा कठिन होता है, वहां क्लिष्टत्व दोष होता है
उदाहरण :
1. हेम सुता पति वाहन प्रिय, तुम इसमें रत्ती न फेर
( यहाँ - 'हेम सूता' का अर्थ - पार्वती और पति अर्थात् शिव - पति वाहन 'का अर्थ बैल और बैल भी व्यंजक में है जिसका अर्थ - मूर्ख)
2. अजा सहेली तास रिपु ता जननी भरतार
ताके सुत के मीत को सुमिरौं बारंबर।
(अजा - भेड़ , भेड़ की सहेली - बकरी , बकरी का रिपु - काँटा , और उसकी जननी पृथ्वी , पृथ्वी का पति - इंद्र , इंद्र का बेटा अर्जुन, अर्जुन के मित्र श्रीकृष्ण का भजन कर इस प्रकार पूरी पंक्ति का अर्थ हुआ श्रीकृष्ण का बार बार भजन कर )
3. लंका पुरी पति को जो भ्राता, तासु प्रिया मोह नहीं आवति।
(इस पंक्ति का अर्थ मेरी नींद नहीं आ रही है।)
4. कहत कट परदेशी की बात
मंदिर अरध अवधि हरि बदी गया,
हरि - आहार चलि जात ।
वेद , नखत , ग्रह जोरि अर्थ करि ,
को बरजे हम खात।
(सूरदास के इस पद में गोपियाँ कृष्ण के विरह से व्याकुल हैं और विष खाने को मजबूर हो जाती है।)
5. विधि - जननी - जा - जीव जब, देख रहे मुख खोले।
पक्ष नखत घन घर तजा, शोभित किए कपोल।
6. न्यून पद दोष :-
- जब कवि पर अपनी कविता की वाक्य रचना में किसी शब्द की कमी रह जाती है वहाँ न्यून पद दोष होता है
उदाहरण :-
1. राजन्तुम्हारे खडग से यश पुष्प था, विकसित हुआ।
(यहाँ पर यश रूपी फूल की संगति स्थितिने के लिए खडग के साथ लता शब्द का प्रयोग भी संभव था। इसलिए लता शब्द नहीं आने से न्यून पद दोष है।)
2. कृपा दृष्टि हो जाएं यदि बन जावेंगे काम
( यहाँ 'कृपा' शब्द से पहले 'आपकी' और 'काम' शब्द से पहले 'मेरे' शब्दों का प्रयोग होना था । अतः इन पदों की कमी के कारण न्यून पद दोष है)
7. अधिक पदत्व दोष :-
- जब वाक्य में आवश्यकता से अधिक शब्द या शब्दों का निरर्थक प्रयोग किया जाए तो वहाँ पर अधिक पदत्व दोष होता है ।
उदाहरण -
1. पुष्प पराग के रंगकर भ्रमर गुंजरता है।
( यहाँ पुष्प शब्द का प्रयोग व्यर्थ है क्योंकि पराग की उत्पत्ति पुष्प से होती है दूसरी जगह नहीं । इसलिए पराग कहने से ही वाक्य की पूर्ति हो जाती ।)
2. लिपटी पुहुप पराग में सनी सेद मकरंद
3. मुख से बचन बोलता है, कौन रोक सकता है उसे
4. उसे तिहारे शत्रु को खग लता अहिराज
8. अक्रमत्व दोष :-
- जब वाक्य रचना में शब्द का क्रम वाक्य रघना की दृष्टि से दूषित या अनुचित होता है तो वहाँ पर अक्रमत्व दोष होता है ।
उदाहरण -
1. अमानुषी भूमि अवानरी करौं ।
(यहाँ अमानुषी शब्द भूमि शब्द के बाद में आना चाहिए था)
2.सीताजी रघुनाथ को ,अमल कमल की माल
पहिरायी जनु सबन की , हृदयावलि भूपाल
3. घंटो लेके जननि - हरि को गोद में बैठी थी।
4. थे मानवता से भाई दोनों हीन हुए।
9. दुष्क्रमण दोष :-
- जब कविता में उपमान का क्रम लोक या शास्त्र की दृष्टि से क्षतिग्रस्त या अनावश्यक हो वहाँ पर दुष्क्रम दोष होता है।
उदाहरण -
1. राजन देहु तुरंग मोहि ओर देह मतंग ।
(यहां मतंग तुरंग की शंकरिता अधिक मूल्यवान है इसलिए पहले मांग मतंग की घोषणा की जानी चाहिए।)
2. मारूत नंदन मारूत को, खगराज को वेग लजायो।
(यहाँ खगराज का प्रयोग मन के पूर्व होना चाहिए था।)
3. चातक, मोर, चकोर सचाई है पावस के अनुरागी।
( यहां चातक को पावस का अनुरागी कहा जाना लोक प्रॉक्सी का विरुद्घ है क्योंकि वह चंद्रमा का अनुरागी है )
4. शौर्य सूर्य के उदय होने से उठी मलिन अरि कंज
5. नृप मौको गिय दें या मत गजेन्द्र
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