पृष्ठभूमि तथा तात्पर्य
छन्द–शास्त्र भारतीय आर्य भाषा परिवार की अत्यन्त उपयोगी तथा प्राचीनतम भाषा है। इसका प्राचीनतम नाम छन्दोविचिति है । वेद के छः अंगों-
- शिक्षा
- कल्प
- ज्योतिष
- व्याकरण
- निरूक्त
- छन्द शास्त्र
में छन्द को सम्मानित स्थान प्राप्त है। छन्द को वेद के चरण के रूप में प्रस्तुत किया है। अभिव्यक्ति में गति का नाम ही छन्द है । ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त के नवम् मंत्र में छन्द की व्युत्पति ईश्वर से बताई गई है। वेदों में मुख्यतः सात छन्दों -
- गायत्री
- उष्णिक्
- अनुष्टुप्
- पंक्ति
- जगती
- वृहती
- त्रिष्टुप्
के प्रयोग किए गए हैं।
यारक के अनुसार छन्दासि छादनात् अर्थात् छन्द भावों को आच्छादित कर उन्हें समष्टिरूप प्रदान करते हैं। छंद का आत्मा से सम्बन्ध है। आत्मा पर प्राणों का आवरण छंद है।
छन्द शब्द संस्कृत की छद धातु में असुन प्रत्यय लगाने से बना है। यह अनेकार्थवाची है। इसके अर्थ हैं- प्रसन्न करना, फुसलाना, बांधना आच्छादित करना कामना या आकांक्षा करना, अक्षर संख्या का परिमाण करना आदि ।
इन्हीं अर्थों के कारण छन्द का अर्थ प्रसन्न करने वाली वस्तु, आच्छादित, बंधन, अक्षर क्रम विशेष आदि से लिया जाता है। इसे अभिव्यंजना का उपकरण भी कहा है। कात्यायन के अनुसार यदक्षर परिमाण तच्छन्दः अर्थात् जिसमें अक्षरों के परिमाण या संख्या में वर्णों की सत्ता निहित होती है, वह छन्द कहलाता है।
प्रत्येक छन्द में वर्णों की संख्या निर्धारित रहती है। कविता में प्रयुक्त होने वाले वर्ण,मात्रा, यति आदि के संघटन को छन्द कहते हैं। कविता की पंक्ति में मात्रा, वर्ण, यति, चरण, गति, गण, की एक निश्चित व्यवस्था रहती है। इसी का नाम छन्द विधान है। प्रणव या उद्गीथ ही छन्द सृष्टि का आदि रूप है।
शांरव्यापन श्रोत सूत्र के सातवें सूत्र से सत्ताईसवें सूत्र तक वैदिक छन्दों का, ऋग्वेद प्रातिशारव्य में सोलहवें पटल से अठारहवें पटल तक, निदान सूत्रों में, छन्दों का परिचय मिलता है। छन्द ज्ञान निधि आचार्य पिंगल की परम्परा में ही अग्निपुराण, वृतरत्नाकर आदि ग्रन्थों की रचना हुई। छन्द सूत्रों पर आचार्य मृतसंजीवनी बहुत प्रसिद्ध है। यादव प्रकाश व भास्करराय के नाम भी उल्लेखनीय हैं। हलायुध की वृत्ति पिंगल ने अपने ग्रन्थ में पूर्ववर्ती छन्द शास्त्र रचयिताओं में स्कन्ध ग्रीवी क्रौष्टुके, उरोवृहती यास्कस्य, सतो वृहती ताण्डिनः, सर्वत्र सैतवस्य, उद्धर्षिणी सैतवस्य, सिंहोन्नता काश्यपस्य, अन्यत्र रात माण्डव्याय्याम् को उद्धृत किया है किन्तु आज तक उनके ग्रन्थ अनुपलब्ध हैं। वराहमिहिरकृत वृहत्संहिता के पश्चात् पिंगल के पश्चात् - जयदेव छन्दस्, जयकीर्तिकृत छन्दोअनुशासन, केदारमद कृत वृत्तरत्नाकर, आचार्य क्षेमेन्द्रकृत सुवृत्त तिलक, आचार्य हेमचन्द्रकृत छन्दोअनुशासन, गंगादासकृत छन्दोमंजरी, कवि शेखर भट्ट शेखरकृत वृत्तमौक्तिक, देवर्षि श्रीकृष्ण भट्ट कृत वृत्तमुक्तावली, दामोदर मिश्र कृत वाणी भूषण, डॉ. भोला शंकर व्यास द्वारा सम्पादित प्राकृत पैंगलम् श्री जगन्नाथदास भानु कृत छन्द प्रभाकर, डॉ. जानकी नाथ सिंह कृत हिन्दी कवियों का छन्द शास्त्र को योगदान आदि उल्लेखनीय हैं। छन्दों का आश्रय लेकर देवताओं ने स्वर्गलोक को प्राप्त किया था।
हिन्दी में जिन प्रमुख पिंगल ग्रन्थों की रचना हुई है उनमें प्रमुख हैं
मतिराम कृत छन्दहार पिंगल, पद्माकर कृत छन्द मंजरी, भानु कृत छन्द प्रभाकर, रामनरेश त्रिपाठी कृत पद्य रचना, रघुवर दयाल कृत पिंगल प्रकाश, परमानन्द कृत पिंगल पीयूष ।
छन्द के अवयव
छन्द के दो भेद हैं :
- वर्णिक छन्द
- मात्रिक छन्द
जिन छन्दों के पाद अथवा चरण वर्णों की संख्या पर निर्भर रहते हैं वे वर्णिक छन्द हैं तथा जिन छन्दों के पाद मात्राओं की संख्या पर निर्भर करते हैं वे मात्रिक छन्द हैं।
वर्ण
- स्वर अथवा स्वरयुक्त व्यंजन वर्ण कहलाते हैं।
मात्रा
- स्वर / वर्ण की निश्चित उच्चारण कालावधि को मात्रा कहा जाता है। गुरु तथा लघु भेद से मात्राओं के दो भेद हैं।
लघु
- ह्रस्व को लघु कहते हैं । ह्रस्व वर्ण की एक मात्रा गिनी जाती है। अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ये पाँच ह्रस्व स्वर हैं। किसी व्यंजन में इनकी मात्रा रहने पर भी वह लघु वर्ण ही गिना जाएगा। मात्रा गणना के समय लघु के लिए '। चिह्न प्रयोग में आता है तथा दीर्घ के लिए 'S' का चिह्न ।
गुरु
एक से अधिक मात्रा वाले वर्ण को गुरु कहा जाता है। आ, ई, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ अं अः, ये सभी दीर्घ स्वर गुरु कहे जाते हैं।
1. संयुक्ताद्य : संयुक्त वर्ण के पहले वाला वर्ण गुरु होता है - विद्या (वि - गुरु )
2. दीर्घ : का, की, के
3. सानुस्वार : अनुस्वारयुक्त-कंस, वंश, संयम में कं वं सं दीर्घ हैं।
4. विसर्गयुक्त : हरि, भानुः दुःख, निःसृत में रि, नुः दुः, निः गुरु हैं। संयुक्त व्यंजन से पूर्व - सत्य, मन्द, वज में स, म, व गुरु हैं। हलंत् व्यंजन से पूर्व महत्, राजन् सत् में ह, ज, स गुरु हैं।
5. चरण के अन्त में यदि आवश्यकता हो तो वही हमारी यह मातृ भूमि (उपेन्द्र - वज्रा) यहाँ मि छन्द के चरण के अन्त में लघु होने पर भी गुरु माना जाएगा।
विशेष
1. चन्द्र बिन्दु से युक्त होने पर वर्ण की मात्रा में कोई अंतर नहीं पड़ता-हँसी-हैं (लघु) हाँसी हाँ गुरु ।
2. संयुक्त व्यंजन से पूर्व का लघु वर्ण तभी गुरु माना जाएगा जब उसे पढ़ने में उस पर जोर पड़े देश-प्रेम में श पर जोर पड़ेगा तो श गुरु हो जाएगा और जोर नहीं पड़ता है तो लघु रहेगा।
3. संयुक्ताक्षर के पूर्व वर्ण में गुरु मात्रा लगती है। चाहे वह पूर्व वर्ण लघु हो या गुरु किन्तु आघे अक्षर पर कभी मात्रा की गणना नहीं होती है।
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