मात्रिक छन्दउदाहरण-(गीतिका छन्द)मात्रिक छन्दों में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है। इसमें वर्णों की संख्या पर ध्यान नहीं दिया जाता है।
वर्णिक छन्द
वर्णिक छन्द में वर्णों की संख्या निश्चित और नियमित होती है। इनमें मात्राओं की संख्या निश्चित व नियमित हो आवश्यक नहीं है। गणों के आधार पर इनके लक्षणों किया जाता है। यति स्थान निर्धारित रहता हैं।
- वर्णिक छन्द के दो भेद माने गये हैं :-
1. साधारण-1 से 26 वर्ण तक के छन्द साधारण छन्द कहलाते हैं।
2. दण्डक-26 से अधिक वर्ण वाले दण्डक कहलाते हैं।
अन्य छन्द
- उभय छन्द
उभय छन्द में मात्राओं तथा वर्णों दोनों की ही संख्या निश्चित व नियमित होती है-
उदाहरण :-
ऊपर को जल सूख-सूखकर उड़ जाता है।
सरदी से सकुचाय, जलद पदवी पाता है।।
पिघलावै रविताप, धरातल पै गिरता है।
बार-बार इस भाँति, सदा हिरता फिरता है।
(यति-11-13 मात्रा, 8-9 वर्गों पर है)
मात्रा: 24 17
- मुक्त या स्वच्छन्द छन्द
- मुक्त छन्द में परम्परा से हटकर रचना की जाती है। इन छन्दों में लय पर ध्यान रखा भी जा सकता है। किन्तु मात्राओं व वर्णों के नियमों की तरफ कवि कोई ध्या नहीं देता है। मात्रा, वर्ण की चिन्ता नहीं की जाती है। अ
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