रस विधान

                                                    
रस -  
काव्य , कथा , नाटक , उपन्यास आदि के पढ़ने सुनने या उसका अभिनय देखने में जो आनन्द की प्राप्ति होती है उसे रस कहा जाता है



  रस निष्पत्ति


1.भरत मुनि 
     
       आचार्य भरत मुनि रस सिद्धांत के मूल प्रर्वतक हैं।
       उनके अनुसार ----
विभाव (आलम्बन एवं उद्दीपन) अनुभाव और व्याभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

1. इन्होंने रस  को आस्वाद्य माना है

2. विभाव , अनुभाव और वाचिक , आंगिक तथा सात्विक अभिनयों के साथ संयुक्त होकर स्थायी भाव रस रूप में परिणत होता है।

3. स्थायी भाव से तात्पर्य मूल नायक अर्थात् अनुकार्य के स्थायी भाव से है न कि सामाजिक के स्थायी भाव से 

4. प्रेक्षक रस का आस्वाद करता हुआ हयर्षादि भावों को प्राप्त होता हैं।

निष्कर्ष -
          अभिनय एवं भावों के संयोग से उद्बुद्ध स्थायी भाव   ही रस है।

1. भट्ट लोल्लट का उत्पत्तिवाद
इस मत के अनुसार-

संयोगात् का अर्थ - सम्बन्धात् और
निष्पत्ति का अर्थ - उत्पत्ति, अभिव्यक्ति और पुष्टि है।

  • इस मत के अनुसार -रस न तो नट में रहता है, और न सहृदय सामाजिकों के अन्दर रहता है अपितु अनुकार्य नायक राम,सीता आदि के अन्दर रहता है। रस की वास्तविक प्राप्ति अनुकार्य से होती है नट की अभिनेय कुशलता के कारण तथा रस ही समानता के कारण उसमें भी रस की प्रतीति का आरोप कर लिया जाता है। इस आरोप से ही सामाजिक चमत्कृत होकर आनन्दित होते हैं।

1. विभाव के द्वारा रस उत्पन्न किया जाता है।

2.रस और विभाव में उत्पाद्य और उत्पादक भाव सम्बन्ध होता है।

3.अनुभावों के द्वारा रस प्रतीति गम्य होता है। अतः रस और अनुभाव का गम्यगमक भाव सम्बन्ध होता है।

4. संचारी भाव अपनी सत्ता से रस की पुष्टि करते हैं। रस के साथ उनका पोष्यपोषक भाव सम्बन्ध होता है।




2. शंकुक का अनुमितिवाद

इन्होंने संयोगात् शब्द का अर्थ अनुमानत् एवं निष्पत्ति का अर्थ अनुमितिः किया
है। अतः

1. अनुकरण के बल पर चित्र तुरंग न्याय से नट में रस का अनुमान कर लिया
जाता है। अनुमानकर्ता दर्शक को भी उससे आनन्द मिलता है। इस अनुमान
का नाम ही रस है।

2. रामादि के विभावादिकों का नट अपनी शिक्षा और कार्यपटुता से इस प्रकार
अभिनय करता है कि वे विभावादि नट के ही मालूम पड़ते हैं। इस प्रकार अनुकर्ता
नट में रस होता है।

3. सामाजिक केवल उस रस का अनुमान कर लेते हैं।

3. भट्ट नायक का भुक्तिवाद

भट्ट नायक के मतानुसार निष्पत्ति का अर्थ भुक्ति और संयोग का अर्थ भोज्य-भोजक भाव अर्थात् विभावादि भोज्य है।
  • भट्ट नायक रस निष्पत्ति के तीन व्यापार मानते हैं।
1. अभिधा (वाक्य के शब्दार्थ का ज्ञान)

2 भावकत्व (विभाव, अनुभाव, संचारी भाव स्थायी भावों का साधारणीकरण)

3. भोजकत्व (रजोगुण, तमोगुण तथा सतोगुण के उत्कर्ष)

  • इसमें काव्य के अर्थ बोध के अनन्तर ही भावकत्व व्यापार के द्वारा विभावादि रूप सीतादि और रामादि सम्बन्धिनी रति में से सीता और राम से सम्बन्धित अंश को छोड़कर सामान्य रूप से कामिनीत्वेन और रतित्वेन उपस्थापित किये जाते हैं।

  • भोजकत्व व्यापार के द्वारा उक्त रीति से साधारणीकृत विभावादि के साथ उस रति का सहृदय सामाजिकों के द्वारा आस्वादन किया जाता है। इस प्रकार रति काआस्वाद ही रस निष्पत्ति है। इस मत में अभिधा- वाक्यार्थ की प्रतीति, भावकत्व से साधारणीकरण, भोजकत्व के द्वारा भोग को माना गया है।

4. अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद

अभिनव गुप्त ने रस को अभिव्यक्ति माना है और संयोग का अर्थ व्यंग्य व्यंजक भाव। इनके अनुसार- सहृदयों के अंतः करण में कुछ भाव नित्य वासना व संस्काररूप में विद्यमान रहते हैं। सहृदय में स्थित वासना रूपी स्थायी भाव उद्बुद्ध अर्थात्  जाग्रत हो जाते हैं। ये जाग्रत स्थायी भाव ही सामाजिक को रस की अनुभूति कराते हैं।

रस निष्पत्ति सामाजिक में होती है। सामाजिक बाह्य रूप से किसी भाव का नहीं अपितु अपने हृदय में स्थित स्थायी भाव का रसास्वादन करता है।


  • रस का स्वरूप
रस के स्वरूप निर्धारण में निम्न बिन्दु मुख्य है-

1. सहृदय के हृदय में सत्व गुण के उद्रेक के पश्चात् रस का स्वरूप स्पष्ट होता है क्योंकि सत्व गुण के उदित होने पर व्यक्ति राग द्वेष से मुक्त होने लगता है। रसास्वादन के लिए राग द्वेष से मुक्ति प्राप्त करना पहली शर्त है।

2. रस अखण्ड होता है। रस आनन्द मयी चेतना है फलतः उसके खण्ड नहीं किये जा सकते। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में रस स्थिति में विभावादि की पृथक-पृथक अनुभूतिनहीं होती बल्कि उनकी समंजित अनुभूति होती हैं। अखण्ड से तात्पर्य आत्मानुभूति की पूर्णता से है।

3. रस स्व प्रकाशानन्द है। स्व प्रकाशानन्द से तात्पर्य आत्मा का प्राकृतिक मलों से विनिमुक्त होना क्योंकि आत्मा प्रकाशमयी चेतन सत्ता है। जिस प्रकार मेघाच्छादित सूर्य की आभा मलिन प्रतीत होती है उसी प्रकार आत्मा के प्रकाश का भी मलाच्छादित होने के कारण सामाजिक अवलोकन या अनुभव नहीं कर पाता। इस दशा में ये मल तिरोहित हो जाते हैं और रस समय केवल आत्मा अपने मूल रूप में प्रकाशित होने लगती है। आत्मा के प्रकाशमान स्वरूप का नाम ही आनन्द है।

4. रस चिन्मय होता है। चिन्मय से तात्पर्य आत्म स्वरूप से है। रस स्थिति आत्म स्वरूप स्थिति है। जहाँ केवल शुद्ध बुद्ध आत्मा ही व्यक्त रहती है शेष सभी मलों का तिरोभाव हो जाता है। ऐसी स्थिति में रस और आत्मा में कोई अन्तर नहीं रह जाता।

5. रस लोकोत्तर चमत्कार प्राण होता है। अन्य सभी प्रकार के ज्ञान का अभाव ही रस स्थिति का भाव हैं रस की स्थिति में प्रमाता में स्व, पर, तटस्थ आदि का भाव तिरोभाव हो जाता है।

6. रस ब्रह्मानन्द के समान है। काव्यास्वाद और ब्रह्मास्वाद में कोई तात्विक अन्तर नहीं हैं। अन्तर केवल अवधि का है। ब्रह्मानन्द स्थायी होता है जिसका एक बार आस्वादन कर लेने के बाद वह आस्वाद कमी समाप्त नहीं होता जबकि काव्यास्वाद अस्थायी होता है क्योंकि काव्यादि की सहायता से मलों का तिरोभाव ही होता है। उसका समूल नाश नहीं होता।

7. रस में पाया जाने वाला चमत्कार लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रसोद्गत चमत्कार इन्द्रिय अनुभव से परे की वस्तु है। रस चमत्कार के लिए इन्द्रियों के प्रवेश का अवसर नहीं होता। यह चमत्कार लोकोत्तर है।

8. रस की स्थिति अपने स्वरूप से अभिन्न रूप होती है। आस्वाद और रस कोई दो भिन्न भिन्न तत्व नहीं हैं। रस अनुभूति का विषय नहीं है अपितु अनुभूति ही स्वयं रस है। अनुभूति का स्वयं प्रकाशमान स्वरूप ही आनन्द का पर्याय है।
हृदय की मुक्तावस्था ही आनन्द अथवा रस है।


पण्डितराज जगन्नाथ
 
पण्डित राज जगन्नाथ ने आनन्द की तीन कोटियाँ मानी हैं-

1. लौकिक सुख(विषयानन्द), 2. ब्रह्मानन्द, 3. काव्यानन्द ।


विषयानन्द--चैतन्याभास से आभासित अन्तः करण की वृत्तियों के विषय के साथ सामंजस्य से व्युत्पन्न होता है तथा ऐन्द्रिक होता है।



ब्रह्मानन्द----समस्त सासारिक उपाधियों का नाश होकर केवल चैतन्य स्वरूप का भाव ही आनन्द स्वरूप होता है।



काव्यानन्द---सोपाधिक अर्थात् रत्यादि भावों की उपाधि बने रहने पर भी चैतन्य स्वरूप का आभास है।




आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है।

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