यति

 



यति


इसका अर्थ है ठहरना। किसी छन्द का वाचन करते समय प्रत्येक चरण के अन्त में जो अल्प विराम आता है उसे यति कहते हैं। उच्चारण में वक्ता को थोड़ा विश्राम मिलने से नाद सौन्दर्य और निखर उठता है। इससे श्रोता के लिये अर्थबोध भी सुगम हो जाता है।


उदाहरण :


श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार। (दोहा छन्द - 13-11 मात्राओं पर यति) तारे डूबे, तम टल गया, छा गयी व्योम लाली (मन्दाक्रांता छन्द -4-6-7 वर्गों पर यति ।)


गति


छन्द को प्रभावपूर्ण ढंग से पढ़ने पर जो लय उत्पन्न होती है उसे गति कहते हैं। इसके द्वारा छन्द में संगीतात्मकता और ध्वन्यात्मकता आ जाती है। प्रत्येक छन्द की अपनी लय गति होती है


बरखा-काल, मेघ नभ छाये


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