जिस प्रकार आभूषण धारण करने से तन की शोभा बढ़ती है ,ठीक उसी प्रकार काव्य में अलंकार से काव्य की शोभा बढ़ती है।
प्रमुख आचार्य के अलंकार संबंधी विचार-
1. भामह के अनुसार :-
(१) अलंकार काव्य का मूल तत्व है।
यह कथन दो वर्गों में विभाजित होता है।
(क) प्रकृत रूप
(ख) रमणीय रूप
(२) अलंकार का मूल वक्रोक्ति है।
(३) अलंकार और अलंकार्य में भेद नहीं है
(४) रसादि से भी अलंकार प्रतिपादित होते हैं।
2. दण्डी
आचार्य दण्डी के अनुसार काव्य की शोभा करने वाले धर्मों(तत्वों)को अलंकार कहते है।
3. आचार्य रूद्रट
आचार्य रूद्रट के अनुसार कथन के विशिष्ट प्रकार ही अलंकार हैं।
4. आचार्य वामन
आचार्य वामन के अनुसार
(क) काव्य की शोभा के करने वाले (कारण भूत) धर्मों को अलंकार कहते हैं।
(ख) काव्य की शोभा बढ़ाने वाले (अतिशयता के हेतू) धर्म अलंकार हैं।
5. आचार्य विश्वनाथ
आचार्य विश्वनाथ के अनुसार रस आदि का उपकार कर काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्द और अर्थ के जो स्थायी धर्म हैं। उन्हें अलंकार कहते हैं।
6. आचार्य हेमचन्द्र
दोष रहित ,गुण सहित , अलंकारों से युक्त शब्दार्थ ही वास्तविक काव्य है।
7. आचार्य रामचंद्र शुक्ल
भावों का उत्कर्ष दिखाने और वस्तुओं के रूप गुण क्रिया का अधिक तीव्रता के साथ अनुभव करने में सहायक उक्ति को अलंकार कहते हैं।
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