जब किसी व्यक्ति के एक अर्थ में कहे गए शब्द या वाक्य का कोई दूसरा व्यक्ति जानबूझकर दूसरा अर्थ कल्पित करे वहाँ पर पर वक्रोक्ति अलंकार होता है।
वक्रोक्ति अलंकार के भेद -
1. श्लेष वक्रोक्ति
2. काकू वक्रोक्ति
1.श्लेष वक्रोक्ति में श्रोता दो अर्थ वाले (श्लिष्ट) शब्द का दूसरा अर्थ ग्रहण कर लेता हो ।
उदाहरण :-
(1) राधा - को तुम हो ?
कृष्ण- घनश्याम इत है
राधा - तो बरसो कित जाय ?
कृष्ण --- अपना नाम घनश्याम बताते हैं
जबकि राधा --- काले बादल अर्थ ग्रहण करती है।
(2) भिक्षुक गो कित को गिरजा
सो तो माँगन को बलिद्वार गयों री
यहाँ लक्ष्मी ने पार्वती से पूछा - भिक्षुक (शिवजी) कहाँ गए है ?
उत्तर में पार्वती ने कहा भिक्षुक है तो गया होगा भीख माँगने बलि के द्वार
काकू वक्रोक्ति :- जब वक्ता शब्द उच्चारण इस प्रकार करे कि सुनने वाला उसका कोई दूसरा ही अर्थ ग्रहण कर ले । वहाँ काकू वक्रोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण -
मै सुकुमारि नाथ बन जोगू
तुमहिं उचित तप मो कहँ भोगू
( प्रस्तुत पंक्तियों में राम सीता को सुकुमारी बताकर उसे वनवास अपने साथ ले जाने से मना करते हैं। सीता राम के तर्क को न मानकर इस ढंग से उत्तर देती है कि उसके कथन का अर्थ ही बदल जाता है । उक्त कथन का आशय है राम ही वन जाने योग्य नहीं हैं मैं भी हूँ )
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