जहाँ पर वास्तविक विरोध न होते हुए भी वहाँ पर विरोध का आभास होता है वहाँ पर विरोधाभास अलंकार होता है।
उदाहरण ---
1. तन्त्री नाद कवित्त रस , सरस राग रति रंग।
अनबूड़े बूड़े तिरे , जे बूड़े सब अंग।।
2. मीठी लगे अँखियन लुनाई
( आँखों का लावण्य मीठा लगता है जबकि वह स्वाद में खारा होता है )
3. सुधि आये सुधि जाये ।
सुधि (याद , स्मरण ) आते ही सुधि (चेतना ,होश ) चली जाती है
4. या अनुरागी चित्त की गति समझे नहिं कोय।
ज्यौं ज्यौं बूडै श्याम रंग , त्यौ त्यौ उज्जवल होय।।
5. घनि सूखै भरे भादो माँहा ।
अबहु न आये सींचन नांहा ।।
( यहाँ भरे भाद्रमास में घनि के सूखने में विरोध दिखाई पड़ता है परन्तु यहाँ सूखने का अर्थ सूखना न होकर प्रियतम के परदेश से न लौटने पर विरहिणी का विकलता के कारण दुर्बल होते जाना है। )
8. विषमय यह गोदावरी , अमृतन के फल देत ।
केसव जीवन हार को , असेस दुःख हर लेत।।
9. राजघाट पर पुल बँधत गयी पिया के साथ।
आज गये कल देखिके, आज ही लौटे नाथ।।
10. शीतल ज्वाला जलती है , ईंधन होता दृग जल का ।
यह व्यर्थ श्वास चलचल कर , करता काम अनिल का ।।
11. तुम अंधकार ,जीवन को ज्योतित करती ,
तुम विष हो उर में अमृ सुधा सी झरती ।
तुम मरण , विश्व में अमर चेतना भरती ,
तुम निखिल भयंकर , भीति जगत की हरती ।।
( यहाँ अंधकार को ज्योतित करने , विष और अमृत , मरण और अमर चेतना में विरोध होने से विरोधाभास अलंकार है।)
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