जहाँ पर अप्रस्तुत उपमान के द्वारा प्रस्तुत उपमेय का बोध कराया जाए वहाँ पर अन्योक्ति अलंकार होता है।
यहाँ अप्रस्तुत अर्थ उस अर्थ को कहते हैं जो प्रसंग का विषय हो , जिसका वर्णन करना अभीष्ट हो ।
अप्रस्तुत अर्थ वह होता है जो प्रसंग का विषय नहीं होता है परन्तु जो प्रस्तुत अर्थ के समान होता है।
उदाहरण--
1.नहिं पराग, नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल।
अली कली ही सौं बिंध्यो, आगे कौन हवाल।।
2.माली आवत देखकर कलियन करी पुकारि।
फूले - फूले चुन लिये , काल्हि हमारी बारि।।
3. स्वारथ सुकुत न श्रम वृथा , देखु विहंग विचारि।
बाज पराये पानि परि , तू पंछहि न मारि।।
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