छंद के प्रकार

छन्द मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है 
1. मात्रिक
2. वार्णिक 

मात्रिक छंद 
       मात्रिक छंदों में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है। इसमें वर्णों की संख्या पर ध्यान नहीं दिया जाता है।


वार्णिक छंद 
       मात्रिक छन्द
मात्रिक छन्दों में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है। इसमें वर्णों की संख्या
पर ध्यान नहीं दिया जाता है।
उदाहरण-(गीतिका छन्द)
हे प्रभो ! आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए ।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे कीजिए।
लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बने।
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक, वीर व्रतधारी बनें।।

2.वर्णिक छन्द

वर्णिक छन्द में वर्णों की संख्या निश्चित और नियमित होती है। इनमें मात्राओं की संख्या निश्चित व नियमित हो आवश्यक नहीं है। गणों के आधार पर इनके लक्षणों
किया जाता है। यति स्थान निर्धारित रहता हैं। मल्लिका,मन्दाक्रान्ता वंशस्थ छन्द है। वर्णिक छन्द के दो भेद माने गये हैं :-

1. साधारण-1 से 26 वर्ण तक के छन्द साधारण छन्द कहलाते हैं।
2. दण्डक-26 से अधिक वर्ण वाले दण्डक कहलाते हैं।
वर्णिक
26 मात्राएँ
26 मात्राएँ
26 मात्राएँ
26 मात्राएँ
अन्य छन्द
3.उभय छन्द

उभय छन्द में मात्राओं तथा वर्णों दोनों की ही संख्या निश्चित व नियमित
होती है-
उदाहरण :-
ऊपर को जल सूख-सूखकर उड़ जाता है।
सरदी से सकुचाय, जलद पदवी पाता है।।
पिघलावै रविताप, धरातल पै गिरता है।
बार-बार इस भाँति, सदा हिरता फिरता है।
(यति-11-13 मात्रा, 8-9 वर्गों पर है)
मात्रा
24
वर्ण
17
मुक्त या स्वच्छन्द छन्द
इन छन्दों में परम्परा से हटकर रचना की जाती है। इन छन्दों में लय पर ध्यान रखा भी जा सकता है। किन्तु मात्राओं व वर्णों के नियमों की तरफ कवि कोई ध्यान नहीं देता है। मात्रा, वर्ण की चिन्ता नहीं की जाती है। अंग्रेजी के ब्लैक वर्स (Blank
Verse) पद्धति में भिन्न Syllable वाली पंक्तियों होती हैं उसी प्रकार से हिन्दी में भी भिन्न-भिन्न वर्गों की संख्या अथवा मात्राएँ हो सकती हैं।
         

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