मन्दाक्रान्ता छंद

लक्षण:-
1.  यह सम वर्ण छंद है।
2.  इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं
3.  इसमें गण क्रमशः मगण, भगण, नगण , तगण, तगण  और अंत में दो गुरु वर्ण आते हैं  । 
4. इसमें यति 4-6-7 वर्णो पर  होती है।

उदाहरण :-
   तारे डूबे ,तम टल गया , छा गयी व्योम में लाली

रस विधान

                                                    
रस -  
काव्य , कथा , नाटक , उपन्यास आदि के पढ़ने सुनने या उसका अभिनय देखने में जो आनन्द की प्राप्ति होती है उसे रस कहा जाता है



  रस निष्पत्ति


1.भरत मुनि 
     
       आचार्य भरत मुनि रस सिद्धांत के मूल प्रर्वतक हैं।
       उनके अनुसार ----
विभाव (आलम्बन एवं उद्दीपन) अनुभाव और व्याभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

1. इन्होंने रस  को आस्वाद्य माना है

2. विभाव , अनुभाव और वाचिक , आंगिक तथा सात्विक अभिनयों के साथ संयुक्त होकर स्थायी भाव रस रूप में परिणत होता है।

3. स्थायी भाव से तात्पर्य मूल नायक अर्थात् अनुकार्य के स्थायी भाव से है न कि सामाजिक के स्थायी भाव से 

4. प्रेक्षक रस का आस्वाद करता हुआ हयर्षादि भावों को प्राप्त होता हैं।

निष्कर्ष -
          अभिनय एवं भावों के संयोग से उद्बुद्ध स्थायी भाव   ही रस है।

1. भट्ट लोल्लट का उत्पत्तिवाद
इस मत के अनुसार-

संयोगात् का अर्थ - सम्बन्धात् और
निष्पत्ति का अर्थ - उत्पत्ति, अभिव्यक्ति और पुष्टि है।

  • इस मत के अनुसार -रस न तो नट में रहता है, और न सहृदय सामाजिकों के अन्दर रहता है अपितु अनुकार्य नायक राम,सीता आदि के अन्दर रहता है। रस की वास्तविक प्राप्ति अनुकार्य से होती है नट की अभिनेय कुशलता के कारण तथा रस ही समानता के कारण उसमें भी रस की प्रतीति का आरोप कर लिया जाता है। इस आरोप से ही सामाजिक चमत्कृत होकर आनन्दित होते हैं।

1. विभाव के द्वारा रस उत्पन्न किया जाता है।

2.रस और विभाव में उत्पाद्य और उत्पादक भाव सम्बन्ध होता है।

3.अनुभावों के द्वारा रस प्रतीति गम्य होता है। अतः रस और अनुभाव का गम्यगमक भाव सम्बन्ध होता है।

4. संचारी भाव अपनी सत्ता से रस की पुष्टि करते हैं। रस के साथ उनका पोष्यपोषक भाव सम्बन्ध होता है।




2. शंकुक का अनुमितिवाद

इन्होंने संयोगात् शब्द का अर्थ अनुमानत् एवं निष्पत्ति का अर्थ अनुमितिः किया
है। अतः

1. अनुकरण के बल पर चित्र तुरंग न्याय से नट में रस का अनुमान कर लिया
जाता है। अनुमानकर्ता दर्शक को भी उससे आनन्द मिलता है। इस अनुमान
का नाम ही रस है।

2. रामादि के विभावादिकों का नट अपनी शिक्षा और कार्यपटुता से इस प्रकार
अभिनय करता है कि वे विभावादि नट के ही मालूम पड़ते हैं। इस प्रकार अनुकर्ता
नट में रस होता है।

3. सामाजिक केवल उस रस का अनुमान कर लेते हैं।

3. भट्ट नायक का भुक्तिवाद

भट्ट नायक के मतानुसार निष्पत्ति का अर्थ भुक्ति और संयोग का अर्थ भोज्य-भोजक भाव अर्थात् विभावादि भोज्य है।
  • भट्ट नायक रस निष्पत्ति के तीन व्यापार मानते हैं।
1. अभिधा (वाक्य के शब्दार्थ का ज्ञान)

2 भावकत्व (विभाव, अनुभाव, संचारी भाव स्थायी भावों का साधारणीकरण)

3. भोजकत्व (रजोगुण, तमोगुण तथा सतोगुण के उत्कर्ष)

  • इसमें काव्य के अर्थ बोध के अनन्तर ही भावकत्व व्यापार के द्वारा विभावादि रूप सीतादि और रामादि सम्बन्धिनी रति में से सीता और राम से सम्बन्धित अंश को छोड़कर सामान्य रूप से कामिनीत्वेन और रतित्वेन उपस्थापित किये जाते हैं।

  • भोजकत्व व्यापार के द्वारा उक्त रीति से साधारणीकृत विभावादि के साथ उस रति का सहृदय सामाजिकों के द्वारा आस्वादन किया जाता है। इस प्रकार रति काआस्वाद ही रस निष्पत्ति है। इस मत में अभिधा- वाक्यार्थ की प्रतीति, भावकत्व से साधारणीकरण, भोजकत्व के द्वारा भोग को माना गया है।

4. अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद

अभिनव गुप्त ने रस को अभिव्यक्ति माना है और संयोग का अर्थ व्यंग्य व्यंजक भाव। इनके अनुसार- सहृदयों के अंतः करण में कुछ भाव नित्य वासना व संस्काररूप में विद्यमान रहते हैं। सहृदय में स्थित वासना रूपी स्थायी भाव उद्बुद्ध अर्थात्  जाग्रत हो जाते हैं। ये जाग्रत स्थायी भाव ही सामाजिक को रस की अनुभूति कराते हैं।

रस निष्पत्ति सामाजिक में होती है। सामाजिक बाह्य रूप से किसी भाव का नहीं अपितु अपने हृदय में स्थित स्थायी भाव का रसास्वादन करता है।


  • रस का स्वरूप
रस के स्वरूप निर्धारण में निम्न बिन्दु मुख्य है-

1. सहृदय के हृदय में सत्व गुण के उद्रेक के पश्चात् रस का स्वरूप स्पष्ट होता है क्योंकि सत्व गुण के उदित होने पर व्यक्ति राग द्वेष से मुक्त होने लगता है। रसास्वादन के लिए राग द्वेष से मुक्ति प्राप्त करना पहली शर्त है।

2. रस अखण्ड होता है। रस आनन्द मयी चेतना है फलतः उसके खण्ड नहीं किये जा सकते। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में रस स्थिति में विभावादि की पृथक-पृथक अनुभूतिनहीं होती बल्कि उनकी समंजित अनुभूति होती हैं। अखण्ड से तात्पर्य आत्मानुभूति की पूर्णता से है।

3. रस स्व प्रकाशानन्द है। स्व प्रकाशानन्द से तात्पर्य आत्मा का प्राकृतिक मलों से विनिमुक्त होना क्योंकि आत्मा प्रकाशमयी चेतन सत्ता है। जिस प्रकार मेघाच्छादित सूर्य की आभा मलिन प्रतीत होती है उसी प्रकार आत्मा के प्रकाश का भी मलाच्छादित होने के कारण सामाजिक अवलोकन या अनुभव नहीं कर पाता। इस दशा में ये मल तिरोहित हो जाते हैं और रस समय केवल आत्मा अपने मूल रूप में प्रकाशित होने लगती है। आत्मा के प्रकाशमान स्वरूप का नाम ही आनन्द है।

4. रस चिन्मय होता है। चिन्मय से तात्पर्य आत्म स्वरूप से है। रस स्थिति आत्म स्वरूप स्थिति है। जहाँ केवल शुद्ध बुद्ध आत्मा ही व्यक्त रहती है शेष सभी मलों का तिरोभाव हो जाता है। ऐसी स्थिति में रस और आत्मा में कोई अन्तर नहीं रह जाता।

5. रस लोकोत्तर चमत्कार प्राण होता है। अन्य सभी प्रकार के ज्ञान का अभाव ही रस स्थिति का भाव हैं रस की स्थिति में प्रमाता में स्व, पर, तटस्थ आदि का भाव तिरोभाव हो जाता है।

6. रस ब्रह्मानन्द के समान है। काव्यास्वाद और ब्रह्मास्वाद में कोई तात्विक अन्तर नहीं हैं। अन्तर केवल अवधि का है। ब्रह्मानन्द स्थायी होता है जिसका एक बार आस्वादन कर लेने के बाद वह आस्वाद कमी समाप्त नहीं होता जबकि काव्यास्वाद अस्थायी होता है क्योंकि काव्यादि की सहायता से मलों का तिरोभाव ही होता है। उसका समूल नाश नहीं होता।

7. रस में पाया जाने वाला चमत्कार लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रसोद्गत चमत्कार इन्द्रिय अनुभव से परे की वस्तु है। रस चमत्कार के लिए इन्द्रियों के प्रवेश का अवसर नहीं होता। यह चमत्कार लोकोत्तर है।

8. रस की स्थिति अपने स्वरूप से अभिन्न रूप होती है। आस्वाद और रस कोई दो भिन्न भिन्न तत्व नहीं हैं। रस अनुभूति का विषय नहीं है अपितु अनुभूति ही स्वयं रस है। अनुभूति का स्वयं प्रकाशमान स्वरूप ही आनन्द का पर्याय है।
हृदय की मुक्तावस्था ही आनन्द अथवा रस है।


पण्डितराज जगन्नाथ
 
पण्डित राज जगन्नाथ ने आनन्द की तीन कोटियाँ मानी हैं-

1. लौकिक सुख(विषयानन्द), 2. ब्रह्मानन्द, 3. काव्यानन्द ।


विषयानन्द--चैतन्याभास से आभासित अन्तः करण की वृत्तियों के विषय के साथ सामंजस्य से व्युत्पन्न होता है तथा ऐन्द्रिक होता है।



ब्रह्मानन्द----समस्त सासारिक उपाधियों का नाश होकर केवल चैतन्य स्वरूप का भाव ही आनन्द स्वरूप होता है।



काव्यानन्द---सोपाधिक अर्थात् रत्यादि भावों की उपाधि बने रहने पर भी चैतन्य स्वरूप का आभास है।




आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है।

काव्य दोष

        काव्य दोष 

  • काव्य में दोष उसे कहते हैं जो रस का अपकर्ष करता है। जहां भवन ग्रहण करने में कोई बाधा उत्पन्न हो या गतिरोध आ जाए तो शास्त्र में उसे काव्य दोष कहते हैं
       अर्थात् -- जो काव्य के आस्वादन में उद्वेग लाभ करता है या किसी वस्तु के द्वारा कविता का अर्थ ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करता है या उसकी सुंदरता में कमी आती है तो उसे काव्य दोष कहा जाता है।
  •  काव्य के आस्वादन में वर्ग, शब्द, वाक्य, गठन, अलंकार, रस, छंद आदि का प्रयोग नहीं होता है तो बाधा उत्पन्न होती है और उस रचना का सौंदर्य एवं महत्व घट जाता है।
  काव्य दोष के प्रकार :
-
काव्य दोष तीन प्रकार के होते हैं

1. शब्द गत दोष 2. अर्थगत दोष 3. रस दोष

मुख्य दोष का विवरण:-
 
1. श्रुतिकटुत्व दोष -
  
जब कवि के द्वारा कविता में कठोर भाषा का प्रयोग किया जाता है और जो सुनने में गलत नहीं होते हैं, अटकते हैं तो वहाँ पर श्रुतिकटुत्व दोष होता है।

उदाहरण-
 
1. कवि की इकटक डटिक रही टरिया अंगुरिन तारि।
     
2. कवि के कठिन कर्म की करते नहीं हम घृष्टता।
    पर क्यों न विषयोत्कृष्टता विचारोत्कृष्टता ।।
 (  यहां पर घृष्टता , विषयोत्कृष्टता ,विचारोत्कृष्टता जैसे कर्ण कटु शब्दों का प्रयोग होने से सुनने में अच्छे नहीं होते हैं इसलिए यहां श्रुतिकटुत्व दोष होगा  )

3. चक्षु कष्ट दण्डित से उसके अश्रुखण्ड मदित आँचल।

4. षड़ कोपाचार्य शण्डिल्य धधक कर 
    गोलीये सहसा दांत भींचकर।

5. घटित घटित घट घौही अट्ट अट्ट
    चट्ट चट्ट चटकत सुहागन की बलियाँ
    पट्ट पट्ट आँसु गिरत भूमि झट्ट झट्ट
   रट्ट रट्ट नाम हूं पछार खहिं अलिआँ 

6. वचन वक्य करि पुच्छा करि, रूष्ट रिच्छ कपि गुच्छ।
   सुभट्ट ठह घना पट्ट सम, मरहि रच्छस छीच।।


2. च्युत संस्कृति दोष :-
  
  • जब किसी कविता में कोई शब्द व्याकरण के संबंध में एलायंस होता है। तब भाषा के संस्कार के गिरने के कारण वहां पर च्युत संस्कृति दोष बनता है।

उदाहरण-

1. उजाला में क्षण भर रहा 
 (यहां पर उजाले के स्थान पर कवि के द्वारा उजाला शब्द का प्रयोग करने के कारण)

2. राजे विराजे मख भूमि में थे 
   ( यहां कवि ने राजा के स्थान पर राजे शब्द का प्रयोग करने से चुत संस्कृति दोष है )

3.  अरे अमरता के चमकीले पुतले, तेरे जयनाद 
    ( आपके शब्द के स्थान पर तेरी का प्रयोग करने के कारण  )

4. पदार्थ बनन जब सितारा बोला 
    हरि प्रेरित लक्षिमन मन डोला 
  (बोले हुए शब्द के स्थान पर बोली लगानी चाहिए)

3. ग्राम्यत्व दोष : - 
  • जहा पर कवि अपनी कविता में गमारू या बोलचाल की भाषा के शब्दों का प्रयोग करता है तो इसमें शामिल प्रान्तीय या देशज शब्दों के आ जाने से ग्राम्यत्व दोष होता है।
 
उदाहरण -

1. मूँड़ पे मकई धरे सोहत हैं गोपाल
 ( मूँड़ शब्द का शिष्ट समाज में प्रयोग नहीं होता )

2. मच्चक मच्चक मत चलो।
  (हाँ पर मचक शब्द गँवारू है )

3. पड़े झटोले में नींद न आई राति

4. अश्लीलत्व दोष :-
  • जहाँ पर कवि घृणास्पद, लज्जाजनक, या अमंगल सूचक शब्दों का प्रयोग करता है, जिसकी वजह से काव्य में रमेशपन और भद्दापन आ जाता है, तो वहाँ पर अश्लीलत्व दोष होता है।

उदाहरण :-

1. थूक कर चाटने लगे अभी श्रीमान।
   ( थूककर चाटना अभद्र लगता है )

2. रावण के दरबार में स्थित अंगद  पाद
(पाद शब्द से जुगुप्सा या घृणा का भाव पैदा होता है।)

5. क्लिष्टत्व दोष :-
  • जब कवि कविता में ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है, वास्तव में सत्य से अर्थ नहीं होता है, उनके अर्थ को समझने में बड़ा कठिन होता है, वहां क्लिष्टत्व दोष होता है

उदाहरण : 

1. हेम सुता पति वाहन प्रिय, तुम इसमें रत्ती न फेर 

 ( यहाँ - 'हेम सूता' का अर्थ - पार्वती और पति अर्थात् शिव - पति वाहन 'का अर्थ बैल और बैल भी व्यंजक में है जिसका अर्थ - मूर्ख)

2. अजा सहेली तास रिपु ता जननी भरतार
    ताके सुत के मीत को सुमिरौं बारंबर।

(अजा - भेड़ , भेड़ की सहेली - बकरी , बकरी का रिपु - काँटा , और उसकी जननी पृथ्वी , पृथ्वी का पति - इंद्र , इंद्र का बेटा अर्जुन, अर्जुन के मित्र श्रीकृष्ण का भजन कर इस प्रकार पूरी पंक्ति का अर्थ हुआ श्रीकृष्ण का बार बार भजन कर )
 
3. लंका पुरी पति को जो भ्राता, तासु प्रिया मोह नहीं आवति।
 (इस पंक्ति का अर्थ मेरी नींद नहीं आ रही है।)

4. कहत कट परदेशी की बात 
   मंदिर अरध अवधि हरि बदी गया,
   हरि - आहार चलि जात ।
   वेद , नखत , ग्रह जोरि अर्थ करि ,
   को बरजे हम खात।
(सूरदास के इस पद में गोपियाँ कृष्ण के विरह से व्याकुल हैं और विष खाने को मजबूर हो जाती है।)

5. विधि - जननी - जा - जीव जब, देख रहे मुख खोले।
    पक्ष नखत घन घर तजा, शोभित किए कपोल।

6. न्यून पद दोष :-
  • जब कवि पर अपनी कविता की वाक्य रचना में किसी शब्द की कमी रह जाती है वहाँ न्यून पद दोष होता है

उदाहरण :- 
 
 1.  राजन्तुम्हारे खडग से यश पुष्प था, विकसित हुआ। 
 
(यहाँ पर यश रूपी फूल की संगति स्थितिने के लिए खडग के साथ लता शब्द का प्रयोग भी संभव था। इसलिए लता शब्द नहीं आने से न्यून पद दोष है।)

2.   कृपा दृष्टि हो जाएं यदि बन जावेंगे काम 
 
( यहाँ 'कृपा' शब्द से  पहले 'आपकी' और 'काम' शब्द से       पहले 'मेरे' शब्दों का प्रयोग होना था । अतः इन पदों की       कमी के कारण न्यून पद दोष है) 


7. अधिक पदत्व दोष :-
  • जब वाक्य में आवश्यकता से अधिक शब्द या शब्दों का निरर्थक प्रयोग किया जाए तो वहाँ पर अधिक पदत्व दोष होता है । 

उदाहरण -
 
1. पुष्प पराग के रंगकर भ्रमर गुंजरता है।

 ( यहाँ पुष्प शब्द का प्रयोग व्यर्थ है क्योंकि पराग की उत्पत्ति पुष्प से होती है दूसरी जगह नहीं । इसलिए पराग     कहने से ही वाक्य की पूर्ति हो जाती ।)

2. लिपटी पुहुप पराग में सनी सेद मकरंद 

3. मुख से बचन बोलता है, कौन रोक सकता है उसे

4.  उसे तिहारे शत्रु को खग लता अहिराज

8. अक्रमत्व दोष :-
  •   जब वाक्य रचना में शब्द का क्रम वाक्य रघना की दृष्टि से    दूषित या अनुचित होता है तो वहाँ पर अक्रमत्व दोष होता    है ।

उदाहरण -

1. अमानुषी भूमि अवानरी करौं ।
 (यहाँ अमानुषी शब्द भूमि शब्द के बाद में आना चाहिए था)

2.सीताजी रघुनाथ को ,अमल कमल की माल 
   पहिरायी जनु सबन की , हृदयावलि भूपाल 

3. घंटो लेके जननि - हरि को गोद में बैठी थी।

4. थे मानवता से भाई दोनों हीन  हुए।


9. दुष्क्रमण दोष :-
  • जब कविता में उपमान का क्रम लोक या शास्त्र की दृष्टि से क्षतिग्रस्त या अनावश्यक हो वहाँ पर दुष्क्रम दोष होता है।

उदाहरण -

1. राजन देहु तुरंग मोहि ओर देह मतंग ।

(यहां मतंग तुरंग की शंकरिता अधिक मूल्यवान है इसलिए पहले मांग मतंग की घोषणा की जानी चाहिए।)

2. मारूत नंदन मारूत को, खगराज को वेग लजायो।
(यहाँ खगराज का प्रयोग मन के पूर्व होना चाहिए था।)

3. चातक, मोर, चकोर सचाई है पावस के अनुरागी।
 ( यहां चातक को पावस का अनुरागी कहा जाना लोक प्रॉक्सी का विरुद्घ है क्योंकि वह चंद्रमा का अनुरागी है  )

4.  शौर्य सूर्य के उदय होने से उठी मलिन अरि कंज

5. नृप मौको गिय दें या मत गजेन्द्र 
 



काव्य गुण

काव्य गुण :  

रस के उत्कर्ष में सहायक तत्वों को काव्य गुण कहते हैं।
       जिस प्रकार आत्मा के शूरता , कायरता आदि धर्म या गुण होते हैं, उसी प्रकार रस के धर्म गुण कहे जाते हैं।ये काव्य के नित्य धर्म होकर रस का उत्कर्ष बढ़ाते हैं।

भरत मुनि ने काव्य गुणों की संख्या दस निर्धारित की है

1.श्लेष 
2. प्रसाद
3.समता 
4.समाधि
5.माधुर्य
6.ओज
7.सौकुमार्य
8.अर्थ शक्ति
9.उदारता
10.कान्ति

-आचार्य दण्डी इन्हीं दस गुणों को काव्य गुण मानते है

- आचार्य मम्मट ने काव्य ने  'काव्य प्रकाश ' में सभी  गुणों का समाहार तीन गुणों में किया है 

1. ओज गुण 
2. प्रसाद गुण
3. माधुर्य गुण 

1. ओज गुण :- 
  •    ओज शब्द का अर्थ - तेज , प्रकाश , दीप्ति
  •   जो रचशा सुनने वाले के मन में उत्साह , वीरता , आवेश  आदि जाग्रत करने की शक्ति रखती है , उसे ओज गुण कहा जाता है।

-आचार्य भरत मुनि ने समास युक्त पदों वाली , गंभीर   अर्थयुक्त , श्रवण सुखद पदावली को ओज गुण के उपयुक्त   बताया है।

-दण्डी ने समास युक्त पदों की बहुलता से पूर्ण  ऋचना को ओज गुण संयुक्त माना है।

-आचार्य वामन की मान्यता में संयुक्त अक्षरों व संश्लिष्ट पदों का संयोग आवश्यक है।

- विश्वनाथ के अनुसार ओज गुण युक्त रचना में महाप्राण    वर्ण , संयुक्ताक्षर प्रयोग ।

-आचार्य मम्मट ने वीर रस , वीभत्स रस ,रौद्र रस 
  में ओज गुण की  अधिकता मानी है।

ओज गुण की परिभाषा :---
  जिस काव्य रचना को सुनने या पढ़ने में चित्त का विस्तार  हो और मन में तेज उत्पन्न हों , वहाँ ओज गुण अभिव्यंजित   होता है । 

ओज गुण की पहचान 

1. इसमें द्वित्व वर्णों  की अधिकता 
2. संयुक्त वर्णों  का प्रयोग 
3. रेफ , पुरूष वर्णों  तथा लम्बे लम्बे सामासिक शब्दों का प्रयोग
4. मूर्धन्य ध्वनियों का प्रयोग
आदि विशेषताएं ओज गुण की पहचान है


ओज गुण के उदाहरण:-

1. गिर गिर कर भू पर रूण्ड उठे
    कर अट्टहास अरिमुण्ड उठे
    कोलाहल घोर प्रचण्ड उठे 
    रणनाथ पिशाची मुण्ड उठे।

2. बढ़ो करो वीर! स्व जाति का भला 
   अपार दोनों विधि लाभ है हमें 
   किय स्व कर्त्तव्य उबार जो लिया 
   सुकीर्ति पायी यदि भस्म हो गये।

3. हयरूण्ड गिरे , गज झुंड गिरे
   कट कट अवनी पर शुण्ड गिरे
   भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे
   लड़ते लड़ते आदि झुंड गिरे।

2. प्रसाद गुण 
 प्रसाद का शाब्दिक अर्थ होता है -- प्रसन्नता ।
-जिस रचना में सुबोधता , स्वच्छता हो अर्थात् जिस रचना को पढ़कर या सुनकर वो तुरंत समझ में आ जाए ,ऐसी रचना प्रसाद गुण से युक्त मानी जाती है

मम्मट के अनुसार-         
जिस प्रकार आग सूखे ईंधन में तत्काल व्याप्त हो जाती है, उसी प्रकार चित्त में  तुरंत व्याप्त होने वाली रचना में प्रसाद गुण होता है।

आचार्य दण्डी के अनुसार:-
: प्रसाद गुण वहाँ होता है जहाँ सुनते ही शब्द का अर्थ समझ में आ जाए। प्रसाद गुण में सयल , सहज ,भाव व्यंजक शब्दों का प्रयोग किया जाता है
अर्थ की सुबोधता या स्पष्टता इसकी प्रमुख विशेषता होती है।
प्रसाद गुण सभी रसों में विद्यमान रहता हैं।
      भिखारी दास ने इसका लक्षण इस प्रकार लिखा है 
   मन रोचक अक्षर परें , सो है सिथिल शरीर ।
   गुण प्रसाद जल सूक्ति ज्यों , प्रघटै अरथ गम्भीर।।

उदाहरण :-
1. वह आता 
   दो टूक कलेजे के करता 
   पछताता पथ पर आता।

2.देखि सुदामा की दीन दसा,करूना करकै करूनानिधि रोये
   पानी परात को हाथ छुयो नहीं, नैनन के जल सौं पग धौये।

3.जाकी रही भावना जैसी,प्रभू मूरति देखि तिन तैसी.
   देखहिं भूप महार नधीरा, मनहुँ वीर रस धरे सरीरा।

4.यह ऐसा संसार है जैसा सैंवल फूल ,
   दिन दस के व्यौहार को, झूठे रंग न भूल ।

5. विनती सुन लो हे भगवान , हम सब बालक है नादान ।
    विद्या बुद्धि नहीं कुछ पास , हमें बना लो अपना दास ।

6. जाके प्रिय न राम वैदेही
    तजिय ताहि कोटि सम , जद्यपि परम सनेही 

7. चारू चन्द्र की चंचल किरणें , खेल रही हैं जल थल में ।
    स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है, अवनि और अंबर तल में।।

3. माधुर्य गुण :-
  माधुर्य शब्द का अर्थ -  शहद जैसा मीठा ।
    परिभाषा:       
-   जिस काव्य रचना को पढ़कर या सुनकर पाठक या श्रोता का चित्त (मन) द्रवित हो उठे वहाँ माधुर्य गुण होता है।

-दूसरे शब्दों में कहे तो अन्तःकरण को आनन्द , उल्लास से द्रवित करने वाली  कोमल मधूर वर्णो से युक्त रचना में माधुर्य गुण होता है।
 
नोट- शृंगार रस और  करूण रस में  माधुर्य गुण  विद्यमान रहता है।

पहचान :-
1. अनुस्वार युक्त वर्ण 
2. कोमल वर्णो से युक्त पदावली ( क वर्ग, प वर्ग और य र        ल व न्ह ,म्ह ,ल्ह ) का प्रयोग अधिक होता है।
3. परूष वर्णों से रहित पदावली ( ट वर्ग )
4. महाप्राण ध्वनियाँ प्राय कम आती हैं
5. सामासिक पदों का अभाव होता है और यदि आते हैं तो      अल्प सामासिक शब्द 
6. अनुनासिक वर्णों की अधिकता होती है।
7. संयुक्त वर्ण (क्ष,त्र,ज्ञ,श्र,द्ध,द्भ,ह्म,क्र,त्व) नहीं आते हैं।

उदाहरण :-
1. बतरस लालच लाल की ,मुरली धरी लुकाय ।
    सौंह करे, भौंहनि हँसे , देन कहे नट जाय।।

2. मन्द मन्द मुरली बजावत अधर धरे 
    मन्द मन्द निकस्यो मुकुन्द मधु वन तें।

3. अमिय हलाहल मद भरे, श्याम श्वेत रतनार।
    जियत मरत झुकि झुकि परत ,जिहिं चितवन इक बार ।।

   

            

शब्द शक्ति

शब्द शक्ति-
शब्द में निहित अर्थ को प्रकट करने वाले व्यापार (कार्य) को शब्द शक्ति कहतेहैं। 

शब्द शक्ति के तीन भेद होते हैं :-
(1) अभिधा,(2) लक्षणा,(3) व्यंजना।

1.अभिधा:-
शब्द के साधारण एवं व्यावहारिक अर्थ को प्रकट करने वाली शक्ति को अभिधा कहते हैं। यह शक्ति किसी के गुण, जाति, द्रव्य, क्रिया का ज्ञान कराती है।

उदाहरण:-
1. खेत में  गधा चर रहा है
 (गधा शब्द का पशु रूप में अर्थ बताने वाली शक्ति को अभिधा कहा जाता है।)

नोट:-इस शक्ति से निकलने वाले अर्थ को अभिधार्थ या वाच्यार्थ कहते हैं।

अभिधा शब्द शक्ति तीन प्रकार की होती है-
(i) समुदाय मात्र शक्ति (रूढ़ि)
(ii) अवयवमात्र शक्ति (योग)
(iii) समुदायावयोमय शक्ति (योग रूढ़ि)

2. लक्षणा शब्द शक्ति

जहाँ शब्द का मुख्य अर्थ से तो मूल अर्थ प्रकट न हो, किन्तु उस मुख्य अर्थ से सम्बन्ध रखने वाला कोई अन्य अर्थ प्रकट होता है ।  तो वह अन्य अर्थ देने वाला व्यापार,कार्य लक्षणा शक्ति कहलाती है।

उदाहरण

1.मोहित चौकन्ना हो गया।
(चौकन्ना का मुख्य अर्थ -चार कान वाला एवंअन्य अर्थ - किसी बात को ध्यान से सुनना,सजग हो जाना।)
2.दिलीप तो निरा गधा है।
(मुख्य अर्थ -जानवर, गधा, लम्बे कान वाला पशु विशेष।)यहाँ गधे का अर्थ मूर्ख है यह लक्षणा शक्ति के रूप में प्रकट हुआ है।
  • लक्षणा के चार कारण बताए गए हैं-
(i) मुख्य अर्थ का बोध होना चाहिए।
(ii) मुख्यार्थ के साथ ही लक्ष्यार्थ का सम्बन्ध हो ।
(iii) रूढ़ि।
(iv) प्रयोजन ।

इनमें से प्रथम दो का होना तो लक्ष्यार्थ ज्ञान के लिए परम आवश्यक है। 
इस प्रकार लक्षणा प्रवृत्ति में तीन कारण हुए-

 (1) मुख्यार्थ का  बोध,
 (2) मुख्यार्थ से सम्बन्ध
 (3) रूढ़ि और प्रयोजन में से कोई एक
 
लक्षणा शब्द शक्ति के भेद
(1) रूढ़ि लक्षणा
(2) उपादान लक्षणा

रूढ़ि लक्षणा 

 उदाहरण - 

1.कलिंग साहसी है।
( कलिंग देश में रहने वाले वहाँ के निवासी (पुरुष) साहसी हैं।)
2. गंगा में घोष है।
 ( गंगा नदी के तट पर ग्राम का होना लक्षणा का बोध कराता है।)

2. उपादान लक्षणा 

उदाहरण:-
1.श्वेत दौड़ रहा हैं
(किसी व्यक्ति ने किसी अवसर पर किसी अन्य व्यक्ति से पूछा- कौनसा घोड़ा
दौड़ रहा है?
उसने उत्तर दिया-श्वेत दौड़ रहा हैं )

2.भाले प्रवेश कर रहे हैं।
(भाले धारण करने वाले पुरुष सैनिकों से आशय है।)


3. व्यंजना शब्द शक्ति:-

परिभाषा--
शब्द के जिस व्यापार से मुख्य और लक्ष्य अर्थ से भिन्न कोई अन्य तीसरे अर्थ का पता लगे उसे व्यंजना शक्ति कहते हैं। 

व्यंजना शक्ति से निकलने वाले अर्थ को व्यंग्यार्थ या ध्वन्यार्थ
भी कहते हैं। व्यंजना शक्ति किसी नये अर्थ को प्रकट करती है जिसका न तो उसके मुख्यअर्थ से सम्बन्ध होता है और न उसके लक्ष्यार्थ से ही। 

-व्यंग्यार्थ पाठक या श्रोता पर निर्भर करता हैं 

-व्यंजना शक्ति केवल अर्थ का संकेत या  इशारा भर देती हैं -बाकी अर्थ कल्पना शक्ति के आधार पर श्रोता या पाठक ही लगाता है।
उदाहरण-
 रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
 पानी गये न उबरै, मोती, मानुष चून।।
 यहाँ प्रस्तुत उदाहरण में पानी के तीन अर्थ हैं-
 1.चून के अर्थ में-जल
 2.मानुष के अर्थ में इज्जत 
 3. मोती के अर्थ में चमक।

-पानी से इज्जत का अर्थ व्यंग्यार्थ हैं यह व्यंजना है।


असंगति अलंकार ( Disconnection)

परिभाषा :--
 जहाँ कारण कहीं और हो और कार्य कहीं अन्यत्र सम्पन्न होता है वहाँ असंगति अलंकार होता है।
( असंगति अलंकार में एक ही समय में कारण एक स्थान पर तथा कार्य अन्यत्र स्थान पर घटित होना वर्णित किया जाए)

 उदाहरण --
 1.  तीर हिय मेरे पै पीर रघुवीरे।
(  यहाँ पर लक्ष्मण जी कह रहे हैं कि तीर तो मेरे हृदय में लगा है परन्तु उसकी पीड़ा प्रभू राम के हृदय में हो रही है।)

2. दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर संग प्रीति ।
    परति गाँठि दुरजन हृदै , दई दई यह नई रीति।।


विरोधाभास अलंकार

 परिभाषा :-
 जहाँ पर वास्तविक विरोध न होते हुए भी वहाँ पर विरोध का आभास होता है वहाँ पर विरोधाभास अलंकार होता है।

उदाहरण ---
 1. तन्त्री नाद कवित्त रस , सरस राग रति रंग।
     अनबूड़े बूड़े तिरे , जे बूड़े सब अंग।।

2. मीठी लगे अँखियन लुनाई 
 ( आँखों का लावण्य मीठा लगता है जबकि वह स्वाद में         खारा होता है )

3. सुधि आये सुधि जाये ।
  सुधि (याद , स्मरण ) आते ही सुधि (चेतना ,होश ) चली      जाती है

4. या अनुरागी चित्त की गति समझे  नहिं कोय।
    ज्यौं ज्यौं बूडै श्याम रंग , त्यौ त्यौ उज्जवल होय।।

5. घनि सूखै भरे भादो माँहा ।
    अबहु न आये सींचन नांहा ।।

( यहाँ भरे भाद्रमास में घनि के सूखने में विरोध दिखाई पड़ता है परन्तु यहाँ सूखने का अर्थ सूखना न होकर प्रियतम के परदेश से न लौटने पर विरहिणी का विकलता के कारण दुर्बल होते जाना है। )

8.  विषमय यह गोदावरी , अमृतन के फल देत ।
     केसव जीवन हार को , असेस दुःख हर लेत।।

9. राजघाट पर पुल बँधत गयी पिया के साथ।
   आज गये कल देखिके, आज ही लौटे नाथ।।

10. शीतल ज्वाला जलती है , ईंधन होता दृग जल का ।
      यह व्यर्थ श्वास चलचल कर , करता काम अनिल का ।।

11. तुम अंधकार ,जीवन को ज्योतित करती , 
      तुम विष हो उर में  अमृ सुधा सी झरती ।
     तुम मरण , विश्व में अमर चेतना भरती ,
     तुम निखिल भयंकर , भीति जगत की हरती ।।

( यहाँ अंधकार को ज्योतित करने , विष और अमृत , मरण और अमर चेतना  में विरोध होने से विरोधाभास अलंकार है।)