छंद के प्रकार

छन्द मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है 
1. मात्रिक
2. वार्णिक 

मात्रिक छंद 
       मात्रिक छंदों में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है। इसमें वर्णों की संख्या पर ध्यान नहीं दिया जाता है।


वार्णिक छंद 
       मात्रिक छन्द
मात्रिक छन्दों में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है। इसमें वर्णों की संख्या
पर ध्यान नहीं दिया जाता है।
उदाहरण-(गीतिका छन्द)
हे प्रभो ! आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए ।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे कीजिए।
लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बने।
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक, वीर व्रतधारी बनें।।

2.वर्णिक छन्द

वर्णिक छन्द में वर्णों की संख्या निश्चित और नियमित होती है। इनमें मात्राओं की संख्या निश्चित व नियमित हो आवश्यक नहीं है। गणों के आधार पर इनके लक्षणों
किया जाता है। यति स्थान निर्धारित रहता हैं। मल्लिका,मन्दाक्रान्ता वंशस्थ छन्द है। वर्णिक छन्द के दो भेद माने गये हैं :-

1. साधारण-1 से 26 वर्ण तक के छन्द साधारण छन्द कहलाते हैं।
2. दण्डक-26 से अधिक वर्ण वाले दण्डक कहलाते हैं।
वर्णिक
26 मात्राएँ
26 मात्राएँ
26 मात्राएँ
26 मात्राएँ
अन्य छन्द
3.उभय छन्द

उभय छन्द में मात्राओं तथा वर्णों दोनों की ही संख्या निश्चित व नियमित
होती है-
उदाहरण :-
ऊपर को जल सूख-सूखकर उड़ जाता है।
सरदी से सकुचाय, जलद पदवी पाता है।।
पिघलावै रविताप, धरातल पै गिरता है।
बार-बार इस भाँति, सदा हिरता फिरता है।
(यति-11-13 मात्रा, 8-9 वर्गों पर है)
मात्रा
24
वर्ण
17
मुक्त या स्वच्छन्द छन्द
इन छन्दों में परम्परा से हटकर रचना की जाती है। इन छन्दों में लय पर ध्यान रखा भी जा सकता है। किन्तु मात्राओं व वर्णों के नियमों की तरफ कवि कोई ध्यान नहीं देता है। मात्रा, वर्ण की चिन्ता नहीं की जाती है। अंग्रेजी के ब्लैक वर्स (Blank
Verse) पद्धति में भिन्न Syllable वाली पंक्तियों होती हैं उसी प्रकार से हिन्दी में भी भिन्न-भिन्न वर्गों की संख्या अथवा मात्राएँ हो सकती हैं।
         

वाक्य

                                      वाक्य

वक्ता द्वारा कही गई बात के अर्थ को पूर्ण रूप से स्पष्ट करने वाले शब्द समूह को वाक्य कहते हैं
     भाषा की सबसे छोटी इकाई वर्ण होती है और वर्णों के सार्थक समूह से शब्द निर्मित होते हैं तथा शब्दों के सार्थक समूह से वाक्य अर्थात अगर शब्दों के सार्थक क्रम को बदल दिया जाए तो वक्ता का अभिप्राय स्पष्ट नहीं हो सकेगा

अर्थ के संप्रेषण की दृष्टि से भाषा की मूल इकाई वाक्य है संरचना की दृष्टि से पदों का सार्थक समूह ही वाक्य है
                         
                         वाक्य के अंग

मुक्तक वाक्य के दो अंग होते हैं
 1. उद्देश्य  
 2. विधेय

1. उद्देश्य :-
 वाक्य  में जिस के संबंध में कुछ कहा जाता है उसे उद्देश्य कहते हैं वाक्य में कर्ता और उसका विस्तार उद्देश्य के अंतर्गत आते हैं
 
 जैसे:-  राधा ने खाना बनाया
           राजू पुस्तक पढ़ रहा है

2. विधेय :- उद्देश्य अर्थात कर्ता के संबंध में  वाक्य में जो कुछ भी कहा जाता है वह विधेय होता है
 
जैसे -  राधा खाना बना रही है। 
        राजू पुस्तक पढ़ रहा है।


                    

वाच्य

                                                    वाच्य

क्रिया का वह रूप वाच्य कहलाता है जिससे मालूम हो कि वाक्य में प्रधानता किसकी है-कर्ता की, कर्म की या भाव की। इससे क्रिया का उद्देश्य ज्ञात होता है। 
 
अँग्रेज़ी में वाच्य को ‘Voice' कहते हैं। 

● वाच्य तीन प्रकार के होते हैं-

● वाच्य
1.कर्तृ वाच्य
2.कर्म वाच्य
3.भाव वाच्य

1. कर्तृ वाच्य-   जब वाक्य में प्रयुक्त क्रिया का सीधा और प्रधान संबंध कर्ता से होता है, उसे कर्तृवाच्य कहते हैं। इसमें क्रिया के लिंग, वचन कर्ता के अनुसार प्रयुक्त होते हैं। अर्थात् क्रिया का प्रधान विषय कर्ता है और क्रिया का प्रयोग कर्ता के अनुसार होगा।

 जैसे-
        -  मैं पुस्तक पढ़ता हूँ।
        -  विमला ने मेहँदी लगाई।
        -   तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की।


2. कर्मवाच्य- जब क्रिया का संबंध वाक्य में प्रयुक्त कर्म से होता है, उसे कर्म वाच्य कहते हैं।अतः क्रिया के लिंग, वचन कर्ता के अनुसार न होकर कर्म के अनुसार होते हैं। कर्मवाच्य सदैव सकर्मक क्रिया का ही होता है क्योंकि इसमें कर्म की प्रधानता होती है।
* कर्मवाच्य की क्रिया  प्राय: वहां प्रयुक्त होती है जहां कर्म पर बल होने के कारण कर्ता को प्रकट करना अनावश्यक हो या उसका पता ना हो                                                                    ‌‌                                          -  दूध सीता के द्वारा पीया गया।
       - पत्र सीता के द्वारा लिखा गया।
       - मिठाई मनोज के द्वारा खाई गई।
       - चाय राम के द्वारा पी गई।
इन वाक्यों में 'पीया' और 'लिखा' क्रिया का एकवचन, पुल्लिंग रूप दूध व पत्र अर्थात् कर्म केअनुसार आया है। इसी प्रकार 'खा' व 'पी' एकवचन पुल्लिंग क्रिया 'मिठाई व चाय' कर्म पर आधारित है।


3. भाववाच्य-  

 क्रिया के जिस रूप से यह ज्ञात होता है कि कार्य का प्रमुख विषय भाव है, उसे भाववाच्य कहते हैं। यहाँ कर्ता या कर्म की नहीं क्रिया के अर्थ की प्रधानता होती है। इसमें अकर्मक क्रिया प्रयुक्त होती है। लिंग, वचन न कर्ता के अनुसार होते हैं न कर्म के अनुसार बल्कि सदैव एकवचन,पुल्लिंग एवं अन्य पुरुष में होते हैं।

जैसे :-
      1. राधा से सवेरे उठा नहीं जाता।
      3. मोहन से मिठाई खाई नहीं जाती।
      2. लड़कियां खो - खो खेल कर थक गई।

काल

                                 काल

* काल का अर्थ है समय ।
     क्रिया के जिस रूप से उसके होने का समय मालूम हो , उसे काल कहते हैं । काल के इस रूप से क्रिया की पूर्णता, अपूर्णता के साथ ही संपन्न होने के समय का बोध होता है।

* काल के तीन भेद हैं
1. भूतकाल
2. वर्तमान काल
3. भविष्य काल

(1) भूतकाल :- भूतकाल का अर्थ बीता हुआ समय।          वाक्य में जिस क्रिया रूप से बीते समय का होना          पाया जाता है वह भूतकाल कहलाता है।
            यह क्रिया व्यापार की समाप्ति बताने वाला            रूप होता है।
 
● भूतकाल के भेद
1. सामान्य भूतकाल - 
 उदाहरण-  प्रशांत ने गाना गाया।
                 बच्चे सो चुके थे।

2. संदिग्ध भूतकाल-
उदाहरण-  राधा ने खाना बना लिया होगा।
           -    चाय पंकज ने ही बनाई होगी         

3. हेतुहेतुमद भूतकाल-
 उदाहरण- आपने पढा़ई की होती तो उत्तीर्ण हो जाते।

4. आसन्न भूतकाल-
उदाहरण-  गाँव में साधु आए हैं।
             -  राकेश ने गाना गाया है।

5. पूर्ण भूतकाल- 
उदाहरण- भारत 1947 में स्वतंत्र हो गया था।

6. अपूर्ण भूतकाल-
 उदाहरण- सुमन खाना बना रही थी।
             - संगीता पुस्तक पढ़ती थी।


(2) वर्तमान काल :-
  क्रिया का वह रूप जिससे कार्य का वर्तमान समय में      होना पाया जाए उसे वर्तमान काल कहते हैं ।
  यह काल कार्य निरंतर हो रहा है की जानकारी देता है

● वर्तमान काल के भेद-

1. सामान्य वर्तमान काल -
उदाहरण- प्रशांत खेल रहा है।
            - राधा गीत गा रही है।

2. संभाव्य वर्तमान काल -
उदाहरण- गोलू परीक्षा देता होगा 

3. आज्ञार्थ वर्तमान काल -
उदा.  - अब मैं चलूँ ?
         - तुम अब भोजन कर लो।


(3) भविष्य काल 
- करीना के जिस रुप से यह ज्ञात होता है कि कार्य आने वाले समय में संपन्न होगा, उसे भविष्य काल कहते हैं

● भविष्य काल के भेद 
1. सामान्य भविष्य काल - 
उदा. - पूनम कविता लिखेगी ।
      - अंकित पुस्तक पढे़गा। 
       - लड़कियां खेलेंगी
      -  महिलाएं गीत गाएंँगी।

2. संभाव्य भविष्य काल -
उदा. - वे शायद अलवर जाएँ।
        - शायद आज बर्षा आए।
 
3. आज्ञार्थ भविष्य काल -
उदा. - तुम्हें आज बाजार जाना होगा





समास

समास शब्द का अर्थ - संक्षिप्त या छोटा करना है। दो या दो से अधिक शब्दों के मेल या संयोग को समास कहते हैं
 इस मेल में विभक्ति चिन्हों का लोप हो जाता है ।

*  समास का उद्भव ही समान अर्थ को कम से कम           शब्द में करने की प्रवृत्ति के कारण हुआ है

* दिन और रात शब्द में तीन शब्दों के प्रयोग के स्थान       पर 'दिन-रात ' समस्त शब्द किया जा सकता है।

* इस प्रकार दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से     विभक्ति चिह्नों के लोप के कारण जो नवीन शब्द बनते    हैं उन्हें सामाजिक या समस्त पद कहते हैं

* सामासिक शब्दों का संबंध व्यक्त करने वाले विभक्ति     चिह्नों आदि के साथ प्रकट करने अथवा लिखनेवाली    रीति को 'विग्रह 'कहते हैं

 जैसे :- माता -पिता = माता और पिता 

* समस्त पद में मुख्यतः दो पद होते हैं 
 -'पूर्व पद 'व 'उत्तर पद' 
* पहले वाले पद को पूर्व पद व दूसरे वाले पद को उत्तर     पर कहते हैं

समस्त पद     पूर्वपद    उत्तरपद      समासविग्रह

 आजन्म        आ           जन्म             जन्म से लेकर
 यथासंभव      यथा        संभव           जैसा संभव हो


                      समास के भेद 

★ मुख्यतः समास के चार भेद होते हैं । 

● जिस समास में पहला शब्द प्रायः प्रधान होता है उसे        अव्ययीभाव समास कहते हैं। 
● जिस समास में दूसरा शब्द प्रधान रहता है उसे               तत्पुरुष समास कहते हैं ।
● जिसमें दोनों शब्द प्रधान होते हैं वह द्वंद समास              कहलाता है। 
● जिस में कोई भी शब्द प्रधान नहीं होता उसे                   बहुव्रीहि समास कहते हैं।

★ तत्पुरुष के पुनः दो अतिरिक्त भेद स्वीकार किए गए     हैं 'कर्मधारय समास' एवं 'द्विगु समास' इस प्रकार           विवेचन की सुविधा के लिए हम समास का निम्न           छह प्रकारों के अंतर्गत अध्ययन करेंगे।


           1.  अव्ययीभाव समास

* अव्ययीभाव समास का पहला पद प्रधान होता है           इसमें पहला पद अव्यय होता हैं 

उदाहरण :-   

समस्त पद        विग्रह

आजन्म            जन्म से लेकर
आमरण            मरण तक 
प्रतिक्षण           हर क्षण
भरपेट              पेट भरकर
यथाशक्ति         शक्ति के अनुसार 
यथासमय         समय के अनुसार
यथासंभव         जैसा संभव हो 
आजीवन          जीवन भर 
भरपेट              पेट भर कर 
आजन्म            जन्म से लेकर 
आमरण            मरण तक 
प्रतिदिन।           हर दिन 
बेखबर              बिना खबर के

*  हिंदी के कुछ संज्ञा शब्दों को दो बार प्रयोग करके          अव्यय शब्दों की तरह काम में लिया जाता है                इसलिए  वहाँ भी अव्ययीभाव समास होता है

जैसे :-   घर - घर  =  घर के बाद घर
             रातों रात  =  रात ही रात में


2.      तत्पुरुष समास 

* तत्पुरुष समास का पहला पद गांव में दूसरा पद प्रधान होता है इसमें कारक की विभक्ति चिह्नों का लोप हो जाता है  ( कर्ता कारक व संबोधन कारक को छोडकर) इसलिए छह  कारकों के आधार पर इस समास के भी छह भेद किए गए हैं

(क)  कर्म तत्पुरुष समास 
    ( इसमें 'को' विभक्ति चिह्न का  का लोप होता है)

समस्त पद     समास विग्रह

सर्वप्रिय         सभी को प्रिय 
यश प्राप्त       यश को प्राप्त
 ग्राम गत        ग्राम को गया हुआ
शरणागत      शरण को आया हुआ

(ख). करण तत्पुरुष समास 
( इसमें 'से' विभक्ति चिह्न का लोप होता है)

समस्त पद       समास विग्रह

भाव पूर्ण          भाव से पूर्ण 
हस्तलिखित       हस्त से लिखित 
बाढ़पीड़ित        बाढ़ से पीड़ित 
बाणाहत            बाण से आहत

(ग) संम्प्रदाय तत्पपुरुष
 ( इसमें 'के लिए' विभक्ति चिह्न का लोप होताहै)

समस्त पद              समास विग्रह

गुरुदक्षिणा            गुरु के लिए दक्षिणा
 बालामृत               बालकों के लिए अमृत 
युद्ध भूमि               युद्ध के लिए भूमि 
विद्यालय                विद्या के लिए आलय 
राह खर्च                 राह के लिए खर्च


(घ)  अपादान तत्पुरुष समास 
  ( इसमें 'से' विभक्ति चिह्न पृथक या अलग के लिए का      लोप होता है )

 समस्त पद          समास विग्रह

 देश निकाला        देश से निकाला 
बंधन मुक्त            बंधन से मुक्त
 पथभ्रष्ट               पथ से भ्रष्ट
 ऋण मुक्त।           ऋण से मुक्त

(ड)  संबंध तत्पपुरुष समास 
  ( इसमें 'का' 'के' 'की'  विभक्ति चिह्नों का लोप होता है)
 
समस्त पद           समास विग्रह

राजमाता           राजा की माता 
जलधारा            जल की धारा 
नगर सेठ             नगर का सेठ 
मतदाता             मत का दाता
गंगाजल             गंगा काजल




(च).    अधिकरण तत्पुरुष समास 
( इसमें 'में'  'पर' चिह्नों का लोप होता है)

समस्त पद       समास विग्रह

 आप बीती           आप पर बीती 
 सिर दर्द               सिर में दर्द 
 घुड़सवार             घोड़े पर सवार
 जलमग्न              जल में मगन


            3.    कर्मधारय समास

कर्मधारय समास में पहले तथा दूसरे पद में विशेषण विशेष्य अथवा उपमान - उपमेय का संबंध होता है

जैसे:-
 समस्त पद                  विग्रह

महापुरुष              महान है जो पुरुष
पीतांबर                पीला है जो अंबर 
प्राण प्रिय             प्रिय है जो प्राणों को 
चंद्र वदन              चंद्रमा के समान वदन 
कमल नयन          कमल के समान नेत्र वाली 
विद्याधन               विद्या रूपी धन 
भवसागर              भव रूपी सागर
मृगनयनी              मृग के समान नेत्र वाले



                   4.  द्विगु समास


द्विगु समास का पहला पद संख्यावाचक अर्थात गणना बोधक होता है तथा दूसरा पद प्रधान होता है क्योंकि इसमें बहुधा यह जाना जाता है कि इतनी वस्तुओं का समूह है

जैसे :-
 समस्त पद                विग्रह
 
सप्ताह        ..         सात अहतों का समूह
 त्रिमूर्ति        ..          तीन मूर्तियों का समूह 
 नवरत्न        ..         नवरत्नों का समूह 
 शताब्दी       ..          सौ अब्दों ( सालों)का समूह
 त्रिभुज         ..         तीन भुजाओं का समूह 
 पंच रात्र       ..         पाँच रात्रियों का समाहार


● कुछ समस्त पदों के अंत में संख्या वाचक शब्दांश       आता है 

पक्षद्वय                 दो पक्षों का समूह 
लेखकद्वय             दो लेखकों का समूह
संकलन त्रय           तीन संकलनो का समूह   

 
                   5.   द्वन्द्व समास 


द्वंद समास में दोनों पद प्रधान होते हैं इसके दोनों पद योजक चिह्न द्वारा जुड़े होते हैं तथा समास विग्रह करने पर 'और' 'या' 'अथवा' 'एवं' आदि शब्द लगते हैं

जैसे:-
 समस्त पद                  विग्रह

 रात- दिन                 रात और दिन 
सीता- राम                सीता और राम 
दाल- रोटी                 दाल और रोटी
माता -पिता               माता और पिता
आयात- निर्यात         आयात और निर्यात
हानि -लाभ               हानि या लाभ
आना -जाना              आना और जाना


               6.  बहुब्रीहि समास 

* जिस समास में पूर्व पद व उत्तर प्रदेश दोनों ही गुणों और अन्य पद प्रधान हो और उसके शाब्दिक अर्थ को छोड़कर एक नया अर्थ निकाला जाता है वह बहुव्रीहि समास कहलाता है ,जैसे- लंबोदर अर्थात लंबा है उदर (पेट) जिसका (दोनों पदों का अर्थ प्रधान ने होकर अन्य अर्थ गणेश प्रधान है)

समस्त पद           विग्रह

घनश्याम     ..     घन जैसा श्याम अर्थात कृष्ण 
नीलकंठ    ..         नीला कंठ है जिसका अर्थात शिव दशानन     ..     दश आनन है जिसके अर्थात रावण गजानन  ..    गज के समान आनन वालाअर्थात गणेश 
त्रिलोचन   ..   तीन है लोचन जिसके अर्थात शिव
हंस वाहिनी   ..  हंस है वाहन जिसका अर्थात सरस्वती महावीर    ..      महान है वीर अर्थात हनुमान 
दिगंबर      ..    दिशा ही है अंबर जिसका अर्थात शिव चतुर्भुज     ..    चार भुजाएं हैं जिसके अर्थात विष्णु









संधि

संधि का शाब्दिक अर्थ है-योग अथवा मेल अर्थात् दो ध्वनियों या दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को ही संधि कहते हैं।

परिभाषा- जब दो वर्ण पास-पास आते हैं या मिलते हैं तो उनमें विकार उत्पन्न होता है अर्थात्
वर्ण में परिवर्तन हो जाता है। यह विकार युक्त मेल ही संधि कहलाता है।

कामताप्रसाद गुरु के अनुसार, 'दो निर्दिष्ट अक्षरों के आस-पास आने के कारण उनके मेल से जो विकार होता है, उसे संधि कहते हैं।'

श्री किशोरीदास वाजपेयी के अनुसार, 'जब दो या अधिक वर्ण पास-पास आते हैं तो कभी-कभी उनमें रूपांतर हो जाता है। इसी रूपांतर को संधि कहते हैं।'

संधि-विच्छेद- वर्णों के मेल से उत्पन्न ध्वनि परिवर्तन को ही संधि कहते हैं। परिणामस्वरूप उच्चारण एवं लेखन दोनों ही स्तरों पर अपने मूल रूप से भिन्नता आ जाती है। अतः उन वर्णों/ध्वनियों को पुनः मूल रूप में लाना ही संधि विच्छेद कहलाता है,

 जैसे-  महा + ईश = महेश
यहाँ (आ + ई) दो वर्णों के मेल से विकार स्वरूप 'ए' ध्वनि उत्पन्न हुई और संधि का जन्म हुआ

संधि विच्छेद के लिए पुनः मूल रूप में लिखना होगा।

           संधि युक्त शब्द      संधि विच्छेद
जैसे-           महेश              महा + ईश
              मनोबल                 मनः + बल

संधि के तीन भेद हैं

1.स्वर संधि
2.व्यंजन संधि
3.विसर्ग संधि

(1) स्वर संधि-दो स्वरों के मेल से उत्पन्न विकार स्वर संधि   कहलाता है। 

स्वर संधि के पाँच भेद हैं-

1.दीर्घ स्वर संधि :- दीर्घ संधि में दो समान स्वर मिलकर दीर्घ हो जाते हैं। यदि अ, आ ,इ, ई, उ ,ऊ, के बाद ये ही लघु या दीर्घ स्वर आएँ तो दोनों मिलकर क्रमशः आ, ई, ऊ हो जाते हैं 

उदाहरण :- 
   अ + अ  = आ      जल  + अभाव = जलाभाव
   अ + आ = आ     भोजन + आलय = भोजनालय  
   आ + अ = आ      विद्या + अर्थी    = विद्यार्थी
   आ + आ = आ       महा + आत्मा  = महात्मा
 
   इ + इ = ई     गिरी + इन्द्र = गिरीन्द्र
   ई + इ = ई    मही + इन्द्र = महीन्द्र
   इ + ई = ई     गिरि + ईश = गिरीश
   ई + ई = ई      रजनी + ईश = रजनीश

  उ + उ = ऊ      भानु + उदय = भानूदय
 उ + ऊ =           लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
ऊ + उ = ऊ       वधू + उत्सव = वधूत्सव
 ऊ + ऊ = ऊ।     भू + ऊर्जा = भूर्जा

2. गुण संधि
यदि 'अ' या 'आ' के बाद' इ' या 'ई' ,'उ' या 'ऊ', 'ऋ' आएँ तो दोनों मिलकर क्रमशः ' ए' 'ओ' और 'अर्' हो जाते हैं 
जैसे:-
 आ+ इ = ए         देव + इंद्र = देवेंद्र
 अ +ई= ए           गण + ईश = गणेश
 आ +इ = ए        यथा + इष्ट = यथेष्ट
 आ + ई = ए        रमा + ईश = रमेश 

अ+उ = ओ          वीर + उचित =वीरोचित
अ+ऊ= ओ।         जल + ऊर्मि = जलोर्मि
आ + उ = ओ        महा + उत्सव =महोत्सव
आ + ऊ = ओ        गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि

अ+ ऋ = अर्       कण्व + ऋषि = कण्वर्षि
आ+ ऋ =अर्       महा + ऋषि = महर्षि


3. वृद्धि संधि

जब 'अ' या 'आ' के बाद 'ए' या 'ऐ' आए तो दोनों मिलकर 'ऐ' तथा 'ओ' या 'औ' हो तो दोनों के स्थान पर 'औ' हो जाता है 

जैसे :- 
अ + ए = ऐ          एक + एक = एकैक 
अ+ ऐ = ऐ         परम+  ऐश्वर्य=  परमैश्वर्य
आ +ए = ऐ         सदा + एव=  सदैव 
आ +ऐ =  ऐ         महा +ऐश्वर्य = महैश्वर्य

अ+ओ= औ         परम  + ओज   = परमौज 
आ+ओ=औ         महा  + ओजस्वी =  महौजस्वी
अ+औ=औ           वन+ औषधि    =   वनौषधि
आ+औ=औ            महा   औषधि = महौषधि

4. यण संधि

यदि 'इ' या 'ई' ' उ' या 'ऊ'  तथा 'ऋ' के बाद कोई भिन्न स्वर आ जाए तो 'इ'  'ई' का 'य्'   'उ' 'ऊ' का 'व्'  तथा 'ऋ' का 'र् ' हो जाता है 

जैसे :-

 इ+ अ = य     अति  + अधिक  = अत्यधिक 
 ई+आ = या     इति  + आदि  =  इत्यादि 
 इ+आ = या     नदी  + आगम = नद्यागम 
  इ+उ = यू      अति  + उत्तम = अत्युत्तम 
  इ+ऊ = यु      अति। +  ऊष्म  = अत्यूष्म
  इ+ए = ये        प्रति + एक  = प्रत्येक      

उ + अ = व      सु  + अच्छ  = स्वच्छ 
उ+आ = वा    सु +  आगत  = स्वागत 
उ+ए =वे        अनु  + ऐषण  अन्वेषण 
उ+इ = वि       अनु + इति। = अन्विति 

ऋ + आ = रा    पितृ। + आज्ञा = पित्राज्ञा

5. अयादि संधि

यदि 'ए' या 'ऐ' 'ओ' या 'औ' के बाद कोई भिन्न स्वर आ जाए  तो 'ए' का 'अय्' 'ऐ' का 'आय्' हो जाता है तथा 'ओ' का 'अव्' और 'औ' का 'आव्' हो जाता है

 जैसे :-
 ए + अ  = अय्          ने + अन = नयन
 ऐ + अ  =आय्          नै  + अक = नायक
ओ + क =अव्           पो + अन = पवन
औ + अ  =आव्         पौ + अक  = पावक



व्यंजन संधि

इस संधि में एक व्यंजन का  किसी दूसरे व्यंजन के साथ अथवा स्वर के साथ मेल होने  पर जो विकार उत्पन्न होता है  उस विकार को व्यंजन संधि कहते हैं 

व्यंजन संधि के प्रमुख नियम

1. यदि प्रत्येक वर्ग के पहले वर्ण  ( क् ,च् ,ट् ,त् ,प् )  के बाद किसी वर्ग का तृतीय  या चतुर्थ वर्ण  अथवा य र ल व या कोई  स्वर आए तो  क् च् ट् त् प् के स्थान पर  अपने वर्ग का तीसरा वर्ण ( ग् ज् ड् द् ब् )  हो जाता है 

जैसे :-
 वाक्  +  ईश    =     वागीश 
 दिक्  + गज     =     दिग्गज 
  वाक् + दान     =     वाग्दान 
 सत्  + वामी     =    सद्वाणी 
अच्  + अंत      =     अजंत 
अप्  +  इंधन    =     अबिंधन
तत् + रूप        =      तद्रूप
जगत् + आनंद  =      जगदानंद
शप् +  द          =      शब्द


2. यदि प्रत्येक वर्ग के पहले वर्ण  क्  च् ट् त्  प् के बाद 'न' या 'म' आए तो क् च् ट् त् प्  अपने वर्ग के पंचम वर्ण ङ् ञ् ण् न् म्  में बदल जाते हैं।

उदाहरण :- 
  वाक्     +    मय   =   वाङ्मय
  षट्       +   मास    =  षण्मास
 जगत्     +   नाथ    =  जगन्नाथ
 अप्       +    मय    =  अम्मय


3. यदि 'म्' के बाद कोई स्पर्श व्यंजन आए तो 'म्' वर्ण में जुड़ने वाले वर्ण के प्रत्येक वर्ग का पंचम वर्ण या अनुस्वार हो जाता है

उदाहरण:-
 अहम्  +    कार  =  अहंकार 
  किम्  +    चित्  =  किंचित्
 सम्     +    गम   =    संगम 
 सम्     +    तोष  =   संतोष

अपवाद 
         सम् + कृत  = संस्कृत 
         सम् + कृति = संस्कृति


 4.  यदि मैं के बाद य र ल व श ष स ह में से किसी भी वर्ण का मेल हो तो  'म' के स्थान पर अनुस्वार ही लगेगा
जैसे -
सम्  + योग      =   संयोग
 सम् +  रचना   =    संरचना
सम्  +   वाद     =   संवाद
 सम् + हार       =   संहार 
सम्  + रक्षण     =  संरक्षण
सम्  + लग्न।    =  संलग्न 
सम्  + वत्       =  संवत्
सम्  + सार।     = संसार

5. यदि त् या द् के बाद ल आए तो 'त्' 'द्'  ल्  में बदल जाता है 

जैसे -  उत्  +  लास  = उल्लास
          उद् + लेख    =  उल्लेख

6.  यदि 'त्' 'द्' के बाद  'ज' 'झ'  हो तो 'त्' 'द्'  ज् में बदल जाएंगे
 जैसे -   सत्  + जन   = सज्जन
           उद्  + झटिका = उज्झटिका

7. यदि त् द्  के बाद  'श'  हो तो त् द्  का च् और श्         का  छ् हो जाता है 

जैसे - उद्  + श्वास  = उच्छ् वास 
        उद्  +  शिष्ट  =  उच्छिष्ट
         सत्  + शास्त्र   =  सच्छास्त्र

8. यदि त् द्  के बाद  'च' , 'छ'  हो तो  त् द्  का च् हो          जाता है 

जैसे :-  उद्  + चारण = उच्चारण
           सत् + चरित्र  = सच्चरित्र
9.  त् या  द् के बाद यदि  'ह' हो तो त् /द्  के स्थान पर     द्  और 'ह' के स्थान पर  'ध' हो जाता है 

जैसे :-  तद् + हित = तद्धित 
           उद् + हार =  उद्धार

10. जब पहले पद के अंत में स्वर्ग हो और आगे के पद का पहला वर्ण 'छ' हो तो 'छ' के स्थान  'च्छ' हो जाता है

जैसे :-  अनु  + छेद  = अनुच्छेद
          परी + छेद   =परिच्छेद 
          आ + छादन = अच्छादन
11. यदि किसी शब्द के अंत में 'अ' या 'आ' को छोड़कर कोई अन्य स्वर आए एवं दूसरे शब्द के आरंभ में 'स' हो तो 'स' के स्थान पर 'ष' हो जाता है

जैसे :- अभी + शेख  = अभिषेक
          वि   +  सम  = विषम 
          नि +  सिद्ध = निषिद्ध
          सु  +   सुप्ति  =सुषुप्ति

12. 'ऋ' 'र' 'ष' के बाद जब कोई स्वर अथवा 'क' वर्गीय या 'प' वर्गीय वर्ण अनुस्वार अथवा 'य' 'व' में से कोई वर्ण आए तो अंत में आने वाला 'न' 'ण' हो जाता है

जैसे :- भर् + अन =    भरण 
          भूष् +  अन = भूषण 
          राम  +  अयन =  रामायण
            प्र  +  मान  = प्रमाण





3. विसर्ग संधि

विसर्ग (: )के साथ स्वर या व्यंजन के मेल में जो विकार होता है उसे विसर्ग  संधि कहते हैं

यदि किसी शब्द के अंत में विसर्ग ध्वनि आती है तथा उसमें बाद में आने वाले शब्द के स्वर अथवा व्यंजन का मेल होने के कारण जो ध्वनि विकार उत्पन्न होता है वही विसर्ग संधि है 
 
विसर्ग संधि के प्रमुख नियम
1. यदि  विसर्ग (: )के पूर्व 'अ ' हो और बाद में 'अ'हो तो दोनों का विकार 'ओ '  हो जाता है

जैसे :- मनः+ विराम  =मनोविराम 
           यश :+अभिलाषा  =यशोभिलासा 
           मनः+ अनुकूल = मनोनुकूल

2. यदि विसर्ग  के पहले 'अ 'हो तथा बाद में किसी भी वर्ग का तीसरा चौथ वर्ण अथवा  यह य, र ,ल ,व वर्ण आते हैं तो विसर्ग 'ओ ' में बदल जाता है
 जैसे -  तपः +  वन =  तपोवन
           अधः + गामी  = अधोगामी 
          वयः+  वृद्ध = वयोवृद्ध
          मनः +   विज्ञान   = मनोविज्ञान
        
3. यदि विसर्ग(:) के बाद 'अ' के अतिरिक्त कोई अन्य स्वर अथवा किसी वर्ग का तृतीय चतुर्थ या पंचम वर्ण  या  य , र , ल , व  हो तो विसर्ग के स्थान में ,र्, हो जाता है

जैसे:-   आयुः +  वेद  = आयुर्वेद 
       ज्योति ः + मय    = ज्योतिर्मय
      आशीः +  वचन  = आशीर्वचन
        धनुः  + धारी   = धनुर्धारी 

4. यदि विसर्ग (:) के बाद 'च' या तालव्य 'श' आता है तो विसर्ग (:)' श् ' हो जाता है
 
जैसे :-  पुनः +  च  = पुनश्च
          तपः  + चर्या =  तपश्चर्या
         यशः + शरीर  =  यशश्शरीर

5. यदि विसर्ग (:) के पहले  अ या  आ तथा बाद में त       या दंत्य  'स' आता है तो विसर्ग (:)  ' स् ' हो जाता है

 जैसे :-   नमः + ते  = नमस्ते 
            मनः+  ताप  = मनस्ताप 
             पुरः + सर =  पुरस्सर


6.  यदि विसर्ग (: ) के पहले ' इ' या ' उ ' स्वर हो और उसके बाद ' क' 'ख' 'प' 'फ' वर्ण आए तो विसर्ग (:) मूर्धन्य ' ष् ' जाता है
 
जैसे :-  आविः  + कार = आविष्कार 
           चतुः +  पाद  = चतुष्पाद 
          चतुः + पथ  = चतुष्पथ
          बहिः +  कार  = बहिष्कार

रस के अवयव

रसावयव
रस के चार अवयव होते हैं-
1. स्थायी भाव
2. विभाव
3.अनुभाव
4. संचारी भाव

स्थायीभाव
प्रत्येक रस में एक प्रधान गुण या मनोविकार होता है जिसके जाग्रत होकर परिपक्व होने से रस का अनुभव होता है।
यह रस अनुभव काल के आरंम्भ से लेकर अन्त तक बना रहता है। इसे स्थायीभाव कहते हैं।

क्र. सं.           रस का नाम।          स्थायी भाव
1.                     शृंगार               रति (प्रेम)
2.                     हास्य                हास
3.                     करूण              शोक
4.                     वीर                  उत्साह
5.                     रौद्र                  क्रोध
6.                     भयानक           भय
7.                     वीभत्स             जुगुप्सा
8.                     अद्भुत               विस्मय
9.                     शांत                 शम(शान्ति)
10.                   वत्सल              वात्सल्य(स्नेह)
11.                  भक्ति                 ईश्वर विषयक प्रेम
स्थायी भाव सहृदय सामाजिक के हृदय में वासना रूप में जन्मजात स्थित वे अनुभूतियां हैं जो स्थायी रूप से विद्यमान रहती हैं।
ये अनुभूतियां सभी में पायी जाती हैं जो यथा स्थिति एवं यथास्थान जाग्रत एवं सुषुप्त होती रहती हैं। ये अनुभूतियां अन्य अनुभूतियों की तुलना में अधिक तीव्र गतिशील एवं सूक्ष्म होती है। इन वृत्तियों का आधार अहंकार की दो मुख्य वृत्तियाँ हैं

राग सुखात्मक प्रकृति की होती है।
द्वेष - दुःखात्मक प्रकृति की होती है।


विभाव----विभाव का अर्थ है कारण।
प्रत्येक रस के प्रधान गुण या मनोविकार के जाग्रत या उद्दीप्त होने के कारणों को विभाव कहते हैं। स्थायी भावों को उद्बोधित करने वाले कारण विभाव कहलाते हैं।
ये ही ये ही स्थायी भावों का विभावन करते हैं अर्थात् आस्वाद योग्य बनाते हैं। अतः विभाव रस की उत्पत्ति के कारणभूत है।

विभाव के भेद
1. आलम्बन विभाव
2. उद्दीपन विभाव

आलम्बन विभाव

जिसके आधार पर अर्थात् जिसको देखकर, जिसको सुनकर रस का गुण या मनोविकार जाग्रत हो उसे आलंबन कहते हैं। भावों का उद्गम जिस मुख्य पात्र या के कारण होता है वह आलम्बन कहा जाता है। भावों को जाग्रत करने वाले ये
ही कारण होते हैं।


शृंगार रस में--       प्रेम पात्र (स्त्री या पुरुष विपरीत लिंगी)
हास्य रस में          जिसे देखकर हँसी आए
रौद्र रस                शत्रु
वत्सल रस में        (विदूषक)
भक्ति रस में           प्रभु आलंबन है।


काव्य नाटकादि में वर्णित जिन पात्रों का आलंबन करके सामाजिक के हृदय में स्थित रति आदि स्थायी भाव रस रूप में अभिव्यक्त होते हैं, उन्हें आलम्बन विभाव कहते हैं।


आलम्बन विभाव के भेद
1. विषय
2. आश्रय 

(जिस पात्र के प्रति किसी पात्र के भाव जाग्रत होते हैं, वह विषय है।)
(पुष्प वाटिका के प्रसंग में सीता को देखकर सीता के प्रति राम के हृदय में प्रेमभाव जाग्रत हुआ। राम यहाँ आश्रय है)

ये विषय और आश्रय हृदय
सहृदय के स्थायी भावों को रसावस्था तक पहुँचाने के कारण होने के आलम्बन विभावहै।


उद्दीपन विभाव

स्थायी भावों को उद्दीप्त करने वाली (अर्थात् उसकी आस्वाद योग्यता बढ़ाने वाली)
देशकालिक परिस्थिति अथवा आलम्बन की चेष्टाओं को उद्दीपन विभाव कहा जाता है।
उद्दीपन विभाव के अन्तर्गत बाहरी परिस्थितियाँ तथा आलम्बन की चेष्टाएं आती
हैं। जैसे शृंगार रस में उद्दीपन विभाव में चाँदनी रात, एकान्त, मधुर संगीत,
नायक-नायिका की वेशभूषा, शारीरिक चेष्टाएँ आदि आते हैं।

 3. अनुभाव

अनु का अर्थ है- पीछे। अर्थात स्थायी भाव के पश्चात् प्रकट होने वाले मनोविकार की चेष्टाएं अनुभाव कहलाती हैं।

किसी रस के गुण या मनोविकार जाग्रत होने पर उन्हें बाह्य चेष्टाओं द्वारा प्रकट किया जाता है। आश्रय की ऐसी शारीरिक चेष्टाओं को अनुभाव कहते हैं। ये चेष्टाएँ भाव जाग्रत के उपरान्त आश्रय में उत्पन्न होती है इसीलिए इन्हें अनुभाव कहा जाता है ।

जैसे प्रिय मिलन में रोमांच, अनुराग सहित देखना, अश्रु आना, विरह व्याकुल नायिका द्वारा रूदन, सिसकियां भरना, क्रोध जाग्रत होने पर शस्त्र चलाना, कठोर वाणी बोलना, आँखों का लाल होना आदि अनुभाव कहे जाते हैं।

अन्य अनुभाव हैं- मुस्कराना, (मुख का खिलना, प्रसन्न होना) रोना, निःश्वास लेना, भुजा फड़कना, हाँठ चबाना, काँपना, स्तम्भित हो जाना, एकटक देखना, मुख पीला पड़ना, आवाज काँपना, जम्हाई आना, शरीर की सुधि न रहना आदि।

अनुभाव के भेद

1. आंगिक या कायिक अनुभाव
3. आहार्य अनुभाव
2. वाचिक अनुभाव
4. सात्विक अनुभाव

1. आंगिक अनुभाव (आश्रय की शारीरिक चेष्टाएँ)

आंगिक अनुभाव को कायिक अनुभाव भी कहा जाता है। आंगिक अनुभाव देह संबंधी होते हैं। आश्रय की शरीर सम्बन्धी चेष्टाएँ कायिक या आंगिक अनुभाव कही जातीहैं, 

जैसे-रति भाव जाग्रत होने पर भू विक्षेप, कटाक्ष आदि।
(आंगिक अनुभाव में शरीर सम्बन्धी चेष्टाएँ होती हैं, इन्हें चाहने पर नियंत्रित भी की जा सकती हैं )

जैसे क्रोध-स्थायी भाव के जाग्रत होने पर हाथ पैर चलाना, (आंगिक अनुभाव है जिन्हें चाहने पर रोका भी जा सकता है।)

बहुरि बदन बिधु अचल ढाँकी
पियतन चितै भौंह करि बाँकी
खजन मंजु तिरीछे नैननि
निज पति कहेउ तिनहिं सिय सैननि
                   (ग्राम वधुओं के प्रश्न के उत्तर में)
सीता द्वारा अपने मुख को अँचल से ढकना, भौंहे टेढी कर के प्रियतम राम की ओर देखना, सीता (आश्रय) की वे शारीरिक चेष्टाएं हैं जो राम (आलम्बन) के प्रतिउसके हृदय में स्थित प्रेम (रति) स्थायी भाव का ज्ञान कराती हैं। अतः ये कायिक
अनुभाव हैं।

2. वाचिक अनुभाव
     प्रयत्न पूर्वक वाणी का व्यापार 
- आश्रय के वाग्व्यापार को वाचिक अनुभाव कहते हैं । 
  वाग्व्यापार यानि बोलना । ये प्रयत्न पूर्वक भी किया जा       सकता है और चाहने पर इस पर नियंत्रण भी किया जा     सकता है।

 उदाहरण :- 
    बतरस लालच लाल की मुरली धयी लुकाय 
    सौंह करै, भौंहनि हसैं दैन कहै नटि जाय।
(यहाँ सौह करना , देने के लिए कहना , मना करना वाचिक अनुभाव है।)

3. आहार्य अनुभाव ( आरोपित या कृत्रिम वेशभूषा)

 कृत्रिम वेश रचना को आहार्य अनुभाव कहते हैं।

जैसे प्रियतम से मिलने की उमंग से कोई प्रेमिका आकर्षक वेशभूषा आदि से अपने को सजाती है , उस वेशभूषा रचना को आहार्य अनुभाव कहते हैं।

4. सात्विक अनुभाव
 शरीर के अकृत्रिम अंग विकार को अर्थात आश्रय के किसी प्रकार के बिना यत्न के शारीरिक विकारों को सात्विक अनुभाव कहते हैं 
जैसे शरीर में कम्पन्न हो जाना , रोमांच हो जाना ,आँखों में आँसू आ जाना।

सात्विक अनुभाव आठ प्रकार के होते हैं 
1. स्तम्भ(अंगों का जडवत हो जाना)
2. स्वेद ( पसीना आ जाना)
3. रोमांच( रोगंटे खड़े हो जाना)
4. स्वर भंग ( आवाज न निकलना या टुटना , कुछ का कुछ बोलना )
5.वेपुथ ( काँपना )
6.वैवर्ण्य( मुँह पीला पड़ जाना, रंग उड़ जाना)
7.अश्रु( आँखों में आँसू आ जाना ) 
8.प्रलय(अचेत हो जाना , मूर्छित हो जाना)

4. संचारी भाव
संचरण करने वाले अस्थिर मनोविकारों या  चित्त वृत्तियों को संचारी भाव कहते हैं।

संचारी भावों की प्रकृति संचरण की होती है 
प्रत्येक रस के प्रधान गुण या मनोविकार के साथ साथ कई छोटे छोटे गुण या मनोविकार उत्पन्न होते है, जो प्रधान गुण या मनोविकार के परिपक्व होने में उसकी अनुभूति को और अधिक तीव्र बनाने में सहायक होते हैं और रस को अनुभव करने में सहायता करते हैं।
ये भाव स्थायी भावों की भाती समस्त रसानुभव काल में  स्थायी नहीं बने रहते किन्तु जाग्रत होकर एवं सहायता का कार्य पूरा कर करके तरंग की भाँति विलीन होते रहते हैं 
इन्हें संचारी भाव कहते हैं 

इनका दूसरा नाम व्यभिचारी भाव भी है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने संचारी भावों का वर्गीकरण इस प्रकार किया है

दुःखात्मक    सुखात्मक   उभयात्मक    उदासीन

लज्जा        औत्सुक्य    आवेग             विर्तक 
असूया       आशा         स्मृति             मति
त्रास            हर्ष            विस्मृति           श्रम
अमर्ष          गर्व            दैन्य                निद्रा
अवहित्था    संतोष        जड़ता            विबोध
विषाद        चपलता        स्वप्न
आलस्य      मृदुलता        चिंता
                  धैर्य             चंचलता
शंका           मद
चिंता
नैराश्य
उग्रता
मोह
उन्माद
असन्तोष
ग्लानि
अपस्मार
व्याधि
मरण


1. अमर्ष- 



मन्दाक्रान्ता छंद

लक्षण:-
1.  यह सम वर्ण छंद है।
2.  इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं
3.  इसमें गण क्रमशः मगण, भगण, नगण , तगण, तगण  और अंत में दो गुरु वर्ण आते हैं  । 
4. इसमें यति 4-6-7 वर्णो पर  होती है।

उदाहरण :-
   तारे डूबे ,तम टल गया , छा गयी व्योम में लाली

रस विधान

                                                    
रस -  
काव्य , कथा , नाटक , उपन्यास आदि के पढ़ने सुनने या उसका अभिनय देखने में जो आनन्द की प्राप्ति होती है उसे रस कहा जाता है



  रस निष्पत्ति


1.भरत मुनि 
     
       आचार्य भरत मुनि रस सिद्धांत के मूल प्रर्वतक हैं।
       उनके अनुसार ----
विभाव (आलम्बन एवं उद्दीपन) अनुभाव और व्याभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

1. इन्होंने रस  को आस्वाद्य माना है

2. विभाव , अनुभाव और वाचिक , आंगिक तथा सात्विक अभिनयों के साथ संयुक्त होकर स्थायी भाव रस रूप में परिणत होता है।

3. स्थायी भाव से तात्पर्य मूल नायक अर्थात् अनुकार्य के स्थायी भाव से है न कि सामाजिक के स्थायी भाव से 

4. प्रेक्षक रस का आस्वाद करता हुआ हयर्षादि भावों को प्राप्त होता हैं।

निष्कर्ष -
          अभिनय एवं भावों के संयोग से उद्बुद्ध स्थायी भाव   ही रस है।

1. भट्ट लोल्लट का उत्पत्तिवाद
इस मत के अनुसार-

संयोगात् का अर्थ - सम्बन्धात् और
निष्पत्ति का अर्थ - उत्पत्ति, अभिव्यक्ति और पुष्टि है।

  • इस मत के अनुसार -रस न तो नट में रहता है, और न सहृदय सामाजिकों के अन्दर रहता है अपितु अनुकार्य नायक राम,सीता आदि के अन्दर रहता है। रस की वास्तविक प्राप्ति अनुकार्य से होती है नट की अभिनेय कुशलता के कारण तथा रस ही समानता के कारण उसमें भी रस की प्रतीति का आरोप कर लिया जाता है। इस आरोप से ही सामाजिक चमत्कृत होकर आनन्दित होते हैं।

1. विभाव के द्वारा रस उत्पन्न किया जाता है।

2.रस और विभाव में उत्पाद्य और उत्पादक भाव सम्बन्ध होता है।

3.अनुभावों के द्वारा रस प्रतीति गम्य होता है। अतः रस और अनुभाव का गम्यगमक भाव सम्बन्ध होता है।

4. संचारी भाव अपनी सत्ता से रस की पुष्टि करते हैं। रस के साथ उनका पोष्यपोषक भाव सम्बन्ध होता है।




2. शंकुक का अनुमितिवाद

इन्होंने संयोगात् शब्द का अर्थ अनुमानत् एवं निष्पत्ति का अर्थ अनुमितिः किया
है। अतः

1. अनुकरण के बल पर चित्र तुरंग न्याय से नट में रस का अनुमान कर लिया
जाता है। अनुमानकर्ता दर्शक को भी उससे आनन्द मिलता है। इस अनुमान
का नाम ही रस है।

2. रामादि के विभावादिकों का नट अपनी शिक्षा और कार्यपटुता से इस प्रकार
अभिनय करता है कि वे विभावादि नट के ही मालूम पड़ते हैं। इस प्रकार अनुकर्ता
नट में रस होता है।

3. सामाजिक केवल उस रस का अनुमान कर लेते हैं।

3. भट्ट नायक का भुक्तिवाद

भट्ट नायक के मतानुसार निष्पत्ति का अर्थ भुक्ति और संयोग का अर्थ भोज्य-भोजक भाव अर्थात् विभावादि भोज्य है।
  • भट्ट नायक रस निष्पत्ति के तीन व्यापार मानते हैं।
1. अभिधा (वाक्य के शब्दार्थ का ज्ञान)

2 भावकत्व (विभाव, अनुभाव, संचारी भाव स्थायी भावों का साधारणीकरण)

3. भोजकत्व (रजोगुण, तमोगुण तथा सतोगुण के उत्कर्ष)

  • इसमें काव्य के अर्थ बोध के अनन्तर ही भावकत्व व्यापार के द्वारा विभावादि रूप सीतादि और रामादि सम्बन्धिनी रति में से सीता और राम से सम्बन्धित अंश को छोड़कर सामान्य रूप से कामिनीत्वेन और रतित्वेन उपस्थापित किये जाते हैं।

  • भोजकत्व व्यापार के द्वारा उक्त रीति से साधारणीकृत विभावादि के साथ उस रति का सहृदय सामाजिकों के द्वारा आस्वादन किया जाता है। इस प्रकार रति काआस्वाद ही रस निष्पत्ति है। इस मत में अभिधा- वाक्यार्थ की प्रतीति, भावकत्व से साधारणीकरण, भोजकत्व के द्वारा भोग को माना गया है।

4. अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद

अभिनव गुप्त ने रस को अभिव्यक्ति माना है और संयोग का अर्थ व्यंग्य व्यंजक भाव। इनके अनुसार- सहृदयों के अंतः करण में कुछ भाव नित्य वासना व संस्काररूप में विद्यमान रहते हैं। सहृदय में स्थित वासना रूपी स्थायी भाव उद्बुद्ध अर्थात्  जाग्रत हो जाते हैं। ये जाग्रत स्थायी भाव ही सामाजिक को रस की अनुभूति कराते हैं।

रस निष्पत्ति सामाजिक में होती है। सामाजिक बाह्य रूप से किसी भाव का नहीं अपितु अपने हृदय में स्थित स्थायी भाव का रसास्वादन करता है।


  • रस का स्वरूप
रस के स्वरूप निर्धारण में निम्न बिन्दु मुख्य है-

1. सहृदय के हृदय में सत्व गुण के उद्रेक के पश्चात् रस का स्वरूप स्पष्ट होता है क्योंकि सत्व गुण के उदित होने पर व्यक्ति राग द्वेष से मुक्त होने लगता है। रसास्वादन के लिए राग द्वेष से मुक्ति प्राप्त करना पहली शर्त है।

2. रस अखण्ड होता है। रस आनन्द मयी चेतना है फलतः उसके खण्ड नहीं किये जा सकते। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में रस स्थिति में विभावादि की पृथक-पृथक अनुभूतिनहीं होती बल्कि उनकी समंजित अनुभूति होती हैं। अखण्ड से तात्पर्य आत्मानुभूति की पूर्णता से है।

3. रस स्व प्रकाशानन्द है। स्व प्रकाशानन्द से तात्पर्य आत्मा का प्राकृतिक मलों से विनिमुक्त होना क्योंकि आत्मा प्रकाशमयी चेतन सत्ता है। जिस प्रकार मेघाच्छादित सूर्य की आभा मलिन प्रतीत होती है उसी प्रकार आत्मा के प्रकाश का भी मलाच्छादित होने के कारण सामाजिक अवलोकन या अनुभव नहीं कर पाता। इस दशा में ये मल तिरोहित हो जाते हैं और रस समय केवल आत्मा अपने मूल रूप में प्रकाशित होने लगती है। आत्मा के प्रकाशमान स्वरूप का नाम ही आनन्द है।

4. रस चिन्मय होता है। चिन्मय से तात्पर्य आत्म स्वरूप से है। रस स्थिति आत्म स्वरूप स्थिति है। जहाँ केवल शुद्ध बुद्ध आत्मा ही व्यक्त रहती है शेष सभी मलों का तिरोभाव हो जाता है। ऐसी स्थिति में रस और आत्मा में कोई अन्तर नहीं रह जाता।

5. रस लोकोत्तर चमत्कार प्राण होता है। अन्य सभी प्रकार के ज्ञान का अभाव ही रस स्थिति का भाव हैं रस की स्थिति में प्रमाता में स्व, पर, तटस्थ आदि का भाव तिरोभाव हो जाता है।

6. रस ब्रह्मानन्द के समान है। काव्यास्वाद और ब्रह्मास्वाद में कोई तात्विक अन्तर नहीं हैं। अन्तर केवल अवधि का है। ब्रह्मानन्द स्थायी होता है जिसका एक बार आस्वादन कर लेने के बाद वह आस्वाद कमी समाप्त नहीं होता जबकि काव्यास्वाद अस्थायी होता है क्योंकि काव्यादि की सहायता से मलों का तिरोभाव ही होता है। उसका समूल नाश नहीं होता।

7. रस में पाया जाने वाला चमत्कार लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रसोद्गत चमत्कार इन्द्रिय अनुभव से परे की वस्तु है। रस चमत्कार के लिए इन्द्रियों के प्रवेश का अवसर नहीं होता। यह चमत्कार लोकोत्तर है।

8. रस की स्थिति अपने स्वरूप से अभिन्न रूप होती है। आस्वाद और रस कोई दो भिन्न भिन्न तत्व नहीं हैं। रस अनुभूति का विषय नहीं है अपितु अनुभूति ही स्वयं रस है। अनुभूति का स्वयं प्रकाशमान स्वरूप ही आनन्द का पर्याय है।
हृदय की मुक्तावस्था ही आनन्द अथवा रस है।


पण्डितराज जगन्नाथ
 
पण्डित राज जगन्नाथ ने आनन्द की तीन कोटियाँ मानी हैं-

1. लौकिक सुख(विषयानन्द), 2. ब्रह्मानन्द, 3. काव्यानन्द ।


विषयानन्द--चैतन्याभास से आभासित अन्तः करण की वृत्तियों के विषय के साथ सामंजस्य से व्युत्पन्न होता है तथा ऐन्द्रिक होता है।



ब्रह्मानन्द----समस्त सासारिक उपाधियों का नाश होकर केवल चैतन्य स्वरूप का भाव ही आनन्द स्वरूप होता है।



काव्यानन्द---सोपाधिक अर्थात् रत्यादि भावों की उपाधि बने रहने पर भी चैतन्य स्वरूप का आभास है।




आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है।

काव्य दोष

        काव्य दोष 

  • काव्य में दोष उसे कहते हैं जो रस का अपकर्ष करता है। जहां भवन ग्रहण करने में कोई बाधा उत्पन्न हो या गतिरोध आ जाए तो शास्त्र में उसे काव्य दोष कहते हैं
       अर्थात् -- जो काव्य के आस्वादन में उद्वेग लाभ करता है या किसी वस्तु के द्वारा कविता का अर्थ ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करता है या उसकी सुंदरता में कमी आती है तो उसे काव्य दोष कहा जाता है।
  •  काव्य के आस्वादन में वर्ग, शब्द, वाक्य, गठन, अलंकार, रस, छंद आदि का प्रयोग नहीं होता है तो बाधा उत्पन्न होती है और उस रचना का सौंदर्य एवं महत्व घट जाता है।
  काव्य दोष के प्रकार :
-
काव्य दोष तीन प्रकार के होते हैं

1. शब्द गत दोष 2. अर्थगत दोष 3. रस दोष

मुख्य दोष का विवरण:-
 
1. श्रुतिकटुत्व दोष -
  
जब कवि के द्वारा कविता में कठोर भाषा का प्रयोग किया जाता है और जो सुनने में गलत नहीं होते हैं, अटकते हैं तो वहाँ पर श्रुतिकटुत्व दोष होता है।

उदाहरण-
 
1. कवि की इकटक डटिक रही टरिया अंगुरिन तारि।
     
2. कवि के कठिन कर्म की करते नहीं हम घृष्टता।
    पर क्यों न विषयोत्कृष्टता विचारोत्कृष्टता ।।
 (  यहां पर घृष्टता , विषयोत्कृष्टता ,विचारोत्कृष्टता जैसे कर्ण कटु शब्दों का प्रयोग होने से सुनने में अच्छे नहीं होते हैं इसलिए यहां श्रुतिकटुत्व दोष होगा  )

3. चक्षु कष्ट दण्डित से उसके अश्रुखण्ड मदित आँचल।

4. षड़ कोपाचार्य शण्डिल्य धधक कर 
    गोलीये सहसा दांत भींचकर।

5. घटित घटित घट घौही अट्ट अट्ट
    चट्ट चट्ट चटकत सुहागन की बलियाँ
    पट्ट पट्ट आँसु गिरत भूमि झट्ट झट्ट
   रट्ट रट्ट नाम हूं पछार खहिं अलिआँ 

6. वचन वक्य करि पुच्छा करि, रूष्ट रिच्छ कपि गुच्छ।
   सुभट्ट ठह घना पट्ट सम, मरहि रच्छस छीच।।


2. च्युत संस्कृति दोष :-
  
  • जब किसी कविता में कोई शब्द व्याकरण के संबंध में एलायंस होता है। तब भाषा के संस्कार के गिरने के कारण वहां पर च्युत संस्कृति दोष बनता है।

उदाहरण-

1. उजाला में क्षण भर रहा 
 (यहां पर उजाले के स्थान पर कवि के द्वारा उजाला शब्द का प्रयोग करने के कारण)

2. राजे विराजे मख भूमि में थे 
   ( यहां कवि ने राजा के स्थान पर राजे शब्द का प्रयोग करने से चुत संस्कृति दोष है )

3.  अरे अमरता के चमकीले पुतले, तेरे जयनाद 
    ( आपके शब्द के स्थान पर तेरी का प्रयोग करने के कारण  )

4. पदार्थ बनन जब सितारा बोला 
    हरि प्रेरित लक्षिमन मन डोला 
  (बोले हुए शब्द के स्थान पर बोली लगानी चाहिए)

3. ग्राम्यत्व दोष : - 
  • जहा पर कवि अपनी कविता में गमारू या बोलचाल की भाषा के शब्दों का प्रयोग करता है तो इसमें शामिल प्रान्तीय या देशज शब्दों के आ जाने से ग्राम्यत्व दोष होता है।
 
उदाहरण -

1. मूँड़ पे मकई धरे सोहत हैं गोपाल
 ( मूँड़ शब्द का शिष्ट समाज में प्रयोग नहीं होता )

2. मच्चक मच्चक मत चलो।
  (हाँ पर मचक शब्द गँवारू है )

3. पड़े झटोले में नींद न आई राति

4. अश्लीलत्व दोष :-
  • जहाँ पर कवि घृणास्पद, लज्जाजनक, या अमंगल सूचक शब्दों का प्रयोग करता है, जिसकी वजह से काव्य में रमेशपन और भद्दापन आ जाता है, तो वहाँ पर अश्लीलत्व दोष होता है।

उदाहरण :-

1. थूक कर चाटने लगे अभी श्रीमान।
   ( थूककर चाटना अभद्र लगता है )

2. रावण के दरबार में स्थित अंगद  पाद
(पाद शब्द से जुगुप्सा या घृणा का भाव पैदा होता है।)

5. क्लिष्टत्व दोष :-
  • जब कवि कविता में ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है, वास्तव में सत्य से अर्थ नहीं होता है, उनके अर्थ को समझने में बड़ा कठिन होता है, वहां क्लिष्टत्व दोष होता है

उदाहरण : 

1. हेम सुता पति वाहन प्रिय, तुम इसमें रत्ती न फेर 

 ( यहाँ - 'हेम सूता' का अर्थ - पार्वती और पति अर्थात् शिव - पति वाहन 'का अर्थ बैल और बैल भी व्यंजक में है जिसका अर्थ - मूर्ख)

2. अजा सहेली तास रिपु ता जननी भरतार
    ताके सुत के मीत को सुमिरौं बारंबर।

(अजा - भेड़ , भेड़ की सहेली - बकरी , बकरी का रिपु - काँटा , और उसकी जननी पृथ्वी , पृथ्वी का पति - इंद्र , इंद्र का बेटा अर्जुन, अर्जुन के मित्र श्रीकृष्ण का भजन कर इस प्रकार पूरी पंक्ति का अर्थ हुआ श्रीकृष्ण का बार बार भजन कर )
 
3. लंका पुरी पति को जो भ्राता, तासु प्रिया मोह नहीं आवति।
 (इस पंक्ति का अर्थ मेरी नींद नहीं आ रही है।)

4. कहत कट परदेशी की बात 
   मंदिर अरध अवधि हरि बदी गया,
   हरि - आहार चलि जात ।
   वेद , नखत , ग्रह जोरि अर्थ करि ,
   को बरजे हम खात।
(सूरदास के इस पद में गोपियाँ कृष्ण के विरह से व्याकुल हैं और विष खाने को मजबूर हो जाती है।)

5. विधि - जननी - जा - जीव जब, देख रहे मुख खोले।
    पक्ष नखत घन घर तजा, शोभित किए कपोल।

6. न्यून पद दोष :-
  • जब कवि पर अपनी कविता की वाक्य रचना में किसी शब्द की कमी रह जाती है वहाँ न्यून पद दोष होता है

उदाहरण :- 
 
 1.  राजन्तुम्हारे खडग से यश पुष्प था, विकसित हुआ। 
 
(यहाँ पर यश रूपी फूल की संगति स्थितिने के लिए खडग के साथ लता शब्द का प्रयोग भी संभव था। इसलिए लता शब्द नहीं आने से न्यून पद दोष है।)

2.   कृपा दृष्टि हो जाएं यदि बन जावेंगे काम 
 
( यहाँ 'कृपा' शब्द से  पहले 'आपकी' और 'काम' शब्द से       पहले 'मेरे' शब्दों का प्रयोग होना था । अतः इन पदों की       कमी के कारण न्यून पद दोष है) 


7. अधिक पदत्व दोष :-
  • जब वाक्य में आवश्यकता से अधिक शब्द या शब्दों का निरर्थक प्रयोग किया जाए तो वहाँ पर अधिक पदत्व दोष होता है । 

उदाहरण -
 
1. पुष्प पराग के रंगकर भ्रमर गुंजरता है।

 ( यहाँ पुष्प शब्द का प्रयोग व्यर्थ है क्योंकि पराग की उत्पत्ति पुष्प से होती है दूसरी जगह नहीं । इसलिए पराग     कहने से ही वाक्य की पूर्ति हो जाती ।)

2. लिपटी पुहुप पराग में सनी सेद मकरंद 

3. मुख से बचन बोलता है, कौन रोक सकता है उसे

4.  उसे तिहारे शत्रु को खग लता अहिराज

8. अक्रमत्व दोष :-
  •   जब वाक्य रचना में शब्द का क्रम वाक्य रघना की दृष्टि से    दूषित या अनुचित होता है तो वहाँ पर अक्रमत्व दोष होता    है ।

उदाहरण -

1. अमानुषी भूमि अवानरी करौं ।
 (यहाँ अमानुषी शब्द भूमि शब्द के बाद में आना चाहिए था)

2.सीताजी रघुनाथ को ,अमल कमल की माल 
   पहिरायी जनु सबन की , हृदयावलि भूपाल 

3. घंटो लेके जननि - हरि को गोद में बैठी थी।

4. थे मानवता से भाई दोनों हीन  हुए।


9. दुष्क्रमण दोष :-
  • जब कविता में उपमान का क्रम लोक या शास्त्र की दृष्टि से क्षतिग्रस्त या अनावश्यक हो वहाँ पर दुष्क्रम दोष होता है।

उदाहरण -

1. राजन देहु तुरंग मोहि ओर देह मतंग ।

(यहां मतंग तुरंग की शंकरिता अधिक मूल्यवान है इसलिए पहले मांग मतंग की घोषणा की जानी चाहिए।)

2. मारूत नंदन मारूत को, खगराज को वेग लजायो।
(यहाँ खगराज का प्रयोग मन के पूर्व होना चाहिए था।)

3. चातक, मोर, चकोर सचाई है पावस के अनुरागी।
 ( यहां चातक को पावस का अनुरागी कहा जाना लोक प्रॉक्सी का विरुद्घ है क्योंकि वह चंद्रमा का अनुरागी है  )

4.  शौर्य सूर्य के उदय होने से उठी मलिन अरि कंज

5. नृप मौको गिय दें या मत गजेन्द्र 
 



काव्य गुण

काव्य गुण :  

रस के उत्कर्ष में सहायक तत्वों को काव्य गुण कहते हैं।
       जिस प्रकार आत्मा के शूरता , कायरता आदि धर्म या गुण होते हैं, उसी प्रकार रस के धर्म गुण कहे जाते हैं।ये काव्य के नित्य धर्म होकर रस का उत्कर्ष बढ़ाते हैं।

भरत मुनि ने काव्य गुणों की संख्या दस निर्धारित की है

1.श्लेष 
2. प्रसाद
3.समता 
4.समाधि
5.माधुर्य
6.ओज
7.सौकुमार्य
8.अर्थ शक्ति
9.उदारता
10.कान्ति

-आचार्य दण्डी इन्हीं दस गुणों को काव्य गुण मानते है

- आचार्य मम्मट ने काव्य ने  'काव्य प्रकाश ' में सभी  गुणों का समाहार तीन गुणों में किया है 

1. ओज गुण 
2. प्रसाद गुण
3. माधुर्य गुण 

1. ओज गुण :- 
  •    ओज शब्द का अर्थ - तेज , प्रकाश , दीप्ति
  •   जो रचशा सुनने वाले के मन में उत्साह , वीरता , आवेश  आदि जाग्रत करने की शक्ति रखती है , उसे ओज गुण कहा जाता है।

-आचार्य भरत मुनि ने समास युक्त पदों वाली , गंभीर   अर्थयुक्त , श्रवण सुखद पदावली को ओज गुण के उपयुक्त   बताया है।

-दण्डी ने समास युक्त पदों की बहुलता से पूर्ण  ऋचना को ओज गुण संयुक्त माना है।

-आचार्य वामन की मान्यता में संयुक्त अक्षरों व संश्लिष्ट पदों का संयोग आवश्यक है।

- विश्वनाथ के अनुसार ओज गुण युक्त रचना में महाप्राण    वर्ण , संयुक्ताक्षर प्रयोग ।

-आचार्य मम्मट ने वीर रस , वीभत्स रस ,रौद्र रस 
  में ओज गुण की  अधिकता मानी है।

ओज गुण की परिभाषा :---
  जिस काव्य रचना को सुनने या पढ़ने में चित्त का विस्तार  हो और मन में तेज उत्पन्न हों , वहाँ ओज गुण अभिव्यंजित   होता है । 

ओज गुण की पहचान 

1. इसमें द्वित्व वर्णों  की अधिकता 
2. संयुक्त वर्णों  का प्रयोग 
3. रेफ , पुरूष वर्णों  तथा लम्बे लम्बे सामासिक शब्दों का प्रयोग
4. मूर्धन्य ध्वनियों का प्रयोग
आदि विशेषताएं ओज गुण की पहचान है


ओज गुण के उदाहरण:-

1. गिर गिर कर भू पर रूण्ड उठे
    कर अट्टहास अरिमुण्ड उठे
    कोलाहल घोर प्रचण्ड उठे 
    रणनाथ पिशाची मुण्ड उठे।

2. बढ़ो करो वीर! स्व जाति का भला 
   अपार दोनों विधि लाभ है हमें 
   किय स्व कर्त्तव्य उबार जो लिया 
   सुकीर्ति पायी यदि भस्म हो गये।

3. हयरूण्ड गिरे , गज झुंड गिरे
   कट कट अवनी पर शुण्ड गिरे
   भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे
   लड़ते लड़ते आदि झुंड गिरे।

2. प्रसाद गुण 
 प्रसाद का शाब्दिक अर्थ होता है -- प्रसन्नता ।
-जिस रचना में सुबोधता , स्वच्छता हो अर्थात् जिस रचना को पढ़कर या सुनकर वो तुरंत समझ में आ जाए ,ऐसी रचना प्रसाद गुण से युक्त मानी जाती है

मम्मट के अनुसार-         
जिस प्रकार आग सूखे ईंधन में तत्काल व्याप्त हो जाती है, उसी प्रकार चित्त में  तुरंत व्याप्त होने वाली रचना में प्रसाद गुण होता है।

आचार्य दण्डी के अनुसार:-
: प्रसाद गुण वहाँ होता है जहाँ सुनते ही शब्द का अर्थ समझ में आ जाए। प्रसाद गुण में सयल , सहज ,भाव व्यंजक शब्दों का प्रयोग किया जाता है
अर्थ की सुबोधता या स्पष्टता इसकी प्रमुख विशेषता होती है।
प्रसाद गुण सभी रसों में विद्यमान रहता हैं।
      भिखारी दास ने इसका लक्षण इस प्रकार लिखा है 
   मन रोचक अक्षर परें , सो है सिथिल शरीर ।
   गुण प्रसाद जल सूक्ति ज्यों , प्रघटै अरथ गम्भीर।।

उदाहरण :-
1. वह आता 
   दो टूक कलेजे के करता 
   पछताता पथ पर आता।

2.देखि सुदामा की दीन दसा,करूना करकै करूनानिधि रोये
   पानी परात को हाथ छुयो नहीं, नैनन के जल सौं पग धौये।

3.जाकी रही भावना जैसी,प्रभू मूरति देखि तिन तैसी.
   देखहिं भूप महार नधीरा, मनहुँ वीर रस धरे सरीरा।

4.यह ऐसा संसार है जैसा सैंवल फूल ,
   दिन दस के व्यौहार को, झूठे रंग न भूल ।

5. विनती सुन लो हे भगवान , हम सब बालक है नादान ।
    विद्या बुद्धि नहीं कुछ पास , हमें बना लो अपना दास ।

6. जाके प्रिय न राम वैदेही
    तजिय ताहि कोटि सम , जद्यपि परम सनेही 

7. चारू चन्द्र की चंचल किरणें , खेल रही हैं जल थल में ।
    स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है, अवनि और अंबर तल में।।

3. माधुर्य गुण :-
  माधुर्य शब्द का अर्थ -  शहद जैसा मीठा ।
    परिभाषा:       
-   जिस काव्य रचना को पढ़कर या सुनकर पाठक या श्रोता का चित्त (मन) द्रवित हो उठे वहाँ माधुर्य गुण होता है।

-दूसरे शब्दों में कहे तो अन्तःकरण को आनन्द , उल्लास से द्रवित करने वाली  कोमल मधूर वर्णो से युक्त रचना में माधुर्य गुण होता है।
 
नोट- शृंगार रस और  करूण रस में  माधुर्य गुण  विद्यमान रहता है।

पहचान :-
1. अनुस्वार युक्त वर्ण 
2. कोमल वर्णो से युक्त पदावली ( क वर्ग, प वर्ग और य र        ल व न्ह ,म्ह ,ल्ह ) का प्रयोग अधिक होता है।
3. परूष वर्णों से रहित पदावली ( ट वर्ग )
4. महाप्राण ध्वनियाँ प्राय कम आती हैं
5. सामासिक पदों का अभाव होता है और यदि आते हैं तो      अल्प सामासिक शब्द 
6. अनुनासिक वर्णों की अधिकता होती है।
7. संयुक्त वर्ण (क्ष,त्र,ज्ञ,श्र,द्ध,द्भ,ह्म,क्र,त्व) नहीं आते हैं।

उदाहरण :-
1. बतरस लालच लाल की ,मुरली धरी लुकाय ।
    सौंह करे, भौंहनि हँसे , देन कहे नट जाय।।

2. मन्द मन्द मुरली बजावत अधर धरे 
    मन्द मन्द निकस्यो मुकुन्द मधु वन तें।

3. अमिय हलाहल मद भरे, श्याम श्वेत रतनार।
    जियत मरत झुकि झुकि परत ,जिहिं चितवन इक बार ।।

   

            

शब्द शक्ति

शब्द शक्ति-
शब्द में निहित अर्थ को प्रकट करने वाले व्यापार (कार्य) को शब्द शक्ति कहतेहैं। 

शब्द शक्ति के तीन भेद होते हैं :-
(1) अभिधा,(2) लक्षणा,(3) व्यंजना।

1.अभिधा:-
शब्द के साधारण एवं व्यावहारिक अर्थ को प्रकट करने वाली शक्ति को अभिधा कहते हैं। यह शक्ति किसी के गुण, जाति, द्रव्य, क्रिया का ज्ञान कराती है।

उदाहरण:-
1. खेत में  गधा चर रहा है
 (गधा शब्द का पशु रूप में अर्थ बताने वाली शक्ति को अभिधा कहा जाता है।)

नोट:-इस शक्ति से निकलने वाले अर्थ को अभिधार्थ या वाच्यार्थ कहते हैं।

अभिधा शब्द शक्ति तीन प्रकार की होती है-
(i) समुदाय मात्र शक्ति (रूढ़ि)
(ii) अवयवमात्र शक्ति (योग)
(iii) समुदायावयोमय शक्ति (योग रूढ़ि)

2. लक्षणा शब्द शक्ति

जहाँ शब्द का मुख्य अर्थ से तो मूल अर्थ प्रकट न हो, किन्तु उस मुख्य अर्थ से सम्बन्ध रखने वाला कोई अन्य अर्थ प्रकट होता है ।  तो वह अन्य अर्थ देने वाला व्यापार,कार्य लक्षणा शक्ति कहलाती है।

उदाहरण

1.मोहित चौकन्ना हो गया।
(चौकन्ना का मुख्य अर्थ -चार कान वाला एवंअन्य अर्थ - किसी बात को ध्यान से सुनना,सजग हो जाना।)
2.दिलीप तो निरा गधा है।
(मुख्य अर्थ -जानवर, गधा, लम्बे कान वाला पशु विशेष।)यहाँ गधे का अर्थ मूर्ख है यह लक्षणा शक्ति के रूप में प्रकट हुआ है।
  • लक्षणा के चार कारण बताए गए हैं-
(i) मुख्य अर्थ का बोध होना चाहिए।
(ii) मुख्यार्थ के साथ ही लक्ष्यार्थ का सम्बन्ध हो ।
(iii) रूढ़ि।
(iv) प्रयोजन ।

इनमें से प्रथम दो का होना तो लक्ष्यार्थ ज्ञान के लिए परम आवश्यक है। 
इस प्रकार लक्षणा प्रवृत्ति में तीन कारण हुए-

 (1) मुख्यार्थ का  बोध,
 (2) मुख्यार्थ से सम्बन्ध
 (3) रूढ़ि और प्रयोजन में से कोई एक
 
लक्षणा शब्द शक्ति के भेद
(1) रूढ़ि लक्षणा
(2) उपादान लक्षणा

रूढ़ि लक्षणा 

 उदाहरण - 

1.कलिंग साहसी है।
( कलिंग देश में रहने वाले वहाँ के निवासी (पुरुष) साहसी हैं।)
2. गंगा में घोष है।
 ( गंगा नदी के तट पर ग्राम का होना लक्षणा का बोध कराता है।)

2. उपादान लक्षणा 

उदाहरण:-
1.श्वेत दौड़ रहा हैं
(किसी व्यक्ति ने किसी अवसर पर किसी अन्य व्यक्ति से पूछा- कौनसा घोड़ा
दौड़ रहा है?
उसने उत्तर दिया-श्वेत दौड़ रहा हैं )

2.भाले प्रवेश कर रहे हैं।
(भाले धारण करने वाले पुरुष सैनिकों से आशय है।)


3. व्यंजना शब्द शक्ति:-

परिभाषा--
शब्द के जिस व्यापार से मुख्य और लक्ष्य अर्थ से भिन्न कोई अन्य तीसरे अर्थ का पता लगे उसे व्यंजना शक्ति कहते हैं। 

व्यंजना शक्ति से निकलने वाले अर्थ को व्यंग्यार्थ या ध्वन्यार्थ
भी कहते हैं। व्यंजना शक्ति किसी नये अर्थ को प्रकट करती है जिसका न तो उसके मुख्यअर्थ से सम्बन्ध होता है और न उसके लक्ष्यार्थ से ही। 

-व्यंग्यार्थ पाठक या श्रोता पर निर्भर करता हैं 

-व्यंजना शक्ति केवल अर्थ का संकेत या  इशारा भर देती हैं -बाकी अर्थ कल्पना शक्ति के आधार पर श्रोता या पाठक ही लगाता है।
उदाहरण-
 रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
 पानी गये न उबरै, मोती, मानुष चून।।
 यहाँ प्रस्तुत उदाहरण में पानी के तीन अर्थ हैं-
 1.चून के अर्थ में-जल
 2.मानुष के अर्थ में इज्जत 
 3. मोती के अर्थ में चमक।

-पानी से इज्जत का अर्थ व्यंग्यार्थ हैं यह व्यंजना है।


असंगति अलंकार ( Disconnection)

परिभाषा :--
 जहाँ कारण कहीं और हो और कार्य कहीं अन्यत्र सम्पन्न होता है वहाँ असंगति अलंकार होता है।
( असंगति अलंकार में एक ही समय में कारण एक स्थान पर तथा कार्य अन्यत्र स्थान पर घटित होना वर्णित किया जाए)

 उदाहरण --
 1.  तीर हिय मेरे पै पीर रघुवीरे।
(  यहाँ पर लक्ष्मण जी कह रहे हैं कि तीर तो मेरे हृदय में लगा है परन्तु उसकी पीड़ा प्रभू राम के हृदय में हो रही है।)

2. दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर संग प्रीति ।
    परति गाँठि दुरजन हृदै , दई दई यह नई रीति।।


विरोधाभास अलंकार

 परिभाषा :-
 जहाँ पर वास्तविक विरोध न होते हुए भी वहाँ पर विरोध का आभास होता है वहाँ पर विरोधाभास अलंकार होता है।

उदाहरण ---
 1. तन्त्री नाद कवित्त रस , सरस राग रति रंग।
     अनबूड़े बूड़े तिरे , जे बूड़े सब अंग।।

2. मीठी लगे अँखियन लुनाई 
 ( आँखों का लावण्य मीठा लगता है जबकि वह स्वाद में         खारा होता है )

3. सुधि आये सुधि जाये ।
  सुधि (याद , स्मरण ) आते ही सुधि (चेतना ,होश ) चली      जाती है

4. या अनुरागी चित्त की गति समझे  नहिं कोय।
    ज्यौं ज्यौं बूडै श्याम रंग , त्यौ त्यौ उज्जवल होय।।

5. घनि सूखै भरे भादो माँहा ।
    अबहु न आये सींचन नांहा ।।

( यहाँ भरे भाद्रमास में घनि के सूखने में विरोध दिखाई पड़ता है परन्तु यहाँ सूखने का अर्थ सूखना न होकर प्रियतम के परदेश से न लौटने पर विरहिणी का विकलता के कारण दुर्बल होते जाना है। )

8.  विषमय यह गोदावरी , अमृतन के फल देत ।
     केसव जीवन हार को , असेस दुःख हर लेत।।

9. राजघाट पर पुल बँधत गयी पिया के साथ।
   आज गये कल देखिके, आज ही लौटे नाथ।।

10. शीतल ज्वाला जलती है , ईंधन होता दृग जल का ।
      यह व्यर्थ श्वास चलचल कर , करता काम अनिल का ।।

11. तुम अंधकार ,जीवन को ज्योतित करती , 
      तुम विष हो उर में  अमृ सुधा सी झरती ।
     तुम मरण , विश्व में अमर चेतना भरती ,
     तुम निखिल भयंकर , भीति जगत की हरती ।।

( यहाँ अंधकार को ज्योतित करने , विष और अमृत , मरण और अमर चेतना  में विरोध होने से विरोधाभास अलंकार है।)



उत्प्रेक्षा अलंकार

उत्प्रेक्षा अलंकार- (Poetical Fancy)

जब उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाए अर्थात्
एक वस्तु में दूसरी वस्तु की सम्भावना मात्र की गई हो वहाँ, उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

नोट- उत्प्रेक्षा अलंकार में समानता व्यक्त करने के लिए
मानों, मनो, मनहूँ, इव जानों, जनु सा आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण-
1.सोहत ओढ़े पीते पट, श्याम सलौने गात।
   मनहुँ नील मनि सैल पर, आतप पर् यौ प्रभात।। 
 
 2.अम्बर में तारे मानों मोती अनगिन हैं।

 3. नेत्र मानों कमल हैं।
 
4. कहती हुई यों उत्तरा के ,नेत्र जल से भर गए।
   हिम के कणों से पूर्ण मानों , हो गये पंकज नये।।


उत्प्रेक्षा अलंकार के भेद 
1. वस्तूत्प्रेक्षा
2. हेतूत्प्रेक्षा
3. फलोत्प्रेक्षा

1. वस्तूत्प्रेक्षा :- 
जहाँ एक वस्तु में दूसरी वस्तु की संभावना की जाए अर्थात् एक वस्तु को दूसरी वस्तु मान लिया जाए वहाँ वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार होता है-

 उदाहरण--
 1. हरिमुख मानों मधुर मयंक

 2.  सरद ससी बरसात मनों घन घनसार अभेद 

 3.  हरखि हृदय दशरथ पुर आयी ।
      जनु ग्रह दशा दुसह दुखदायी ।।

4. निशान्त के साथ निशेश भी चला ।
    मानों महि के सिर से टली बला।।


2. हेतूत्प्रेक्षा -
 जहाँ पर अहेतु की हेतु के रूप में संभावना या कल्पना व्यक्त की जाए , वहाँ हेतूत्प्रेक्षा अलंकार हैता है
( यहाँ वस्तु का कार्य स्वभाविक होता है परन्तु उसे कारण मान लिया जाता है)

उदाहरण:-
1. बार - बार उस भीषण रव से , कंपती धरणी देख विशेष।
   मानों नील व्योम उतरा हो, आलिंगन के हेतु अन्य शेष

2. विनत शुक नासा का धर ध्यान , 
    बन गये पुष्प पलाश अराल


3.फलोत्प्रेक्षा :-
  जब अफल में फल की संभावना की जाए, वहाँ फलोत्प्रेक्षा अलंकार होता है

उदाहरण--
1.तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाये।
   झुके कूल सों जल परसन, हिल मनहुँ सुहाये।।
( यहाँ पर वृक्ष स्वभाविक रूप से यमुना के जल की ओर झुके हुए हैं पर वर्णन यह किया है कि वे जल को स्पर्श करने के  फल लिए झुके हुए हैं )

2. तव मुख समता लहन को सेवत जलजात ।
( यहाँ बताया गया है कि मुख की समता प्राप्त करने के लिए मानो कमल जल में खड़ा होकर तपस्या कर रहा है।)

3. बढ़त ताड़ को पेड़  यह मनु चूमन को आकाश।

अर्थांलंकार के चार अवयव

1.उपमेय:-
जो उपमा देने योग्य हो अर्थात् जिसको उपमा दी जाती है। जिसको किसी के
समान कहा जाता है।

2.उपमा--
जिसकी उपमा दी जाती है। अर्थात् उपमेय को जिसके समान बताया जाता

3. साधारण धर्म --
उपमेय और उपमान दोनों में समान रहने वाले गुण, क्रिया आदि धर्म को समान
धर्म अथवा साधारण धर्म कहते हैं।
4. वाचक शब्द --
वह शब्द जिसके द्वारा उपमेय और उपमान में समानता बताई जाए।

जाको वर्णन कीजिये सो उपमेय प्रमान।
जाकी समता दीजिये ताहि कहत उपमान ।।
उपमेय उपमान में समता जेहि हित होय।
सो साधारण धर्म है कहत सयाने लोय।।
सो, से सी, इव, तुल, लौं, सम, अरु, सहरी समान।
ज्यों, जैसे, इमि, सरिस, जिमि, उपमा वाचक जान।।

वसंततिलका छंद

 वसन्ततिलका:-( त भ ज ज अंत गुरु गुरु कुल 14 वर्ण)
लक्षण-
1.वसन्त तिलका समवर्ण वृत छन्द है।
2. इसके प्रत्येक चरण में तगण भगण जगण जगण तथा अन्त में दो गुरु वर्ण होते हैं। 
3.प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं।
उदाहरण--
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(अ) थे  दीखते   परम वृद्ध नितान्त रोगी
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       वधू   गृह  में दिखाती या थी नवागत
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       कोई न और इनको तज के कहीं था
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       सूने सभी सदन गोकुल के हुए थे।

(ब) बातें बड़ी सरस थे कहते बिहारी
     छोटे बड़े सकल का हित चाहते थे
     अत्यन्त प्यार संग थे मिलते सबों से
     वे थे सहायक बड़े दुःख के दिनों के

(स) भू में रमी शरद की कमनीयता थी
      नीला अनन्त नभ निर्मल हो गया था
      थी छा गई ककुभ में अमिता सितामा
      उत्फुल्ल सी प्रकृति थी प्रतिभास होती

मानवीकरण अलंकार

 परिभाषा --
                   जहाँ पर अमूर्त भावों का मूर्ती करण कर और जड़ पदार्थों का चेतनवत् वर्णन किया जाता है वहाँ पर मानवीकरण अलंकार होता है। मानवीकरण अलंकार का प्रयोग जड़ का चैतन्यीकरण , अमूर्त भावनाओं का मूर्तिकरण , चेतन का मानवीकरण के रूप में होता है।

उदाहरण : - 
 1.  चुपचाप खड़ी थी वृक्ष पांत।
       सुनती जैसी कुछ निजी  बात।।

2. शरद आया पुलों को पार करता हुआ ।

3.  उधो मन नाही दस बीस ।
     एक हुतो सो गयो स्याम संग , को अराधे ईस ।

4. नेत्र निमीलन करती मानो,
    प्रकृति प्रबुद्ध लगने लगी ।

5.